इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आगरा छावनी परिषद (कैंटोनमेंट बोर्ड) की ओर से अवैध निर्माण के नाम पर जारी 32 साल पुराने नोटिस को रद्द कर दिया है। कहा, सुरक्षा के लिए पुराने लकड़ी के दरवाजे को हटाकर लोहे का लगाना कोई नया निर्माण नहीं है। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने याची आरके शर्मा की विशेष अपील पर सुनवाई करते हुए की। कोर्ट ने एकल पीठ के आदेश उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी गई थी कि मामले में तथ्यों का विवाद है। लिहाजा अनुच्छेद 226 के तहत दाखिल याचिका में हाईकोर्ट दखल नहीं दे सकता।
मामले के मुताबिक कैंटोनमेंट बोर्ड ने 16 अप्रैल 1994 को नोटिस जारी कर उनके निर्माण को अवैध बताया था। अधिवक्ता ने दलील दी कि याची ने कोई नया निर्माण नहीं किया, बल्कि सुरक्षा की दृष्टि से पुराने जर्जर लकड़ी के दरवाजे की जगह सिर्फ लोहे का लगाया था। कोर्ट ने पाया कि 1994 में जारी नोटिस में यह स्पष्ट ही नहीं था कि अवैध निर्माण क्या है। नोटिस के साथ न तो कोई नक्शा संलग्न था और न ही मौके की कोई निरीक्षण रिपोर्ट थी।
बोर्ड के वकील भी कोर्ट के इस सवाल का जवाब नहीं दे सके कि आखिर किस आधार पर इस बदलाव को नया निर्माण मान लिया गया। विशेष अपील स्वीकार कर कोर्ट ने 1994 के मूल नोटिस और 2010 के अपीलीय आदेश को रद्द कर दिया है।
नाबालिग से यौन उत्पीड़न के आरोपी भूतनाथ बाबा की जमानत खारिज
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नाबालिग से अमानवीय कृत्य और यौन उत्पीड़न के आरोपी केसरी उर्फ भूतनाथ बाबा की जमानत खारिज कर दी। साथ ही ट्रायल कोर्ट को मुकदमे के शीघ्र निस्तारण का आदेश दिया है।
यह आदेश न्यायमूर्ति गौतम चौधरी की एकल पीठ ने दिया है। मामला फिरोजाबाद के नगला सिंहनी थाना क्षेत्र का है। 2025 में बाबा पर पॉक्सो के साथ ही एससी/एसटी एक्ट की धाराओं में एफआईआर दर्ज की गई थी। मुकदमा दर्ज करने के बाद बाबा को सात सितंबर को जेल भेजा गया था। रिहाई की मांग के साथ हाईकोर्ट पहुंचे बाबा के वकील ने दलील दी थी कि एफआईआर में दुष्कर्म का कोई सीधा आरोप नहीं है। पीड़िता के बयानों में विरोधाभास है।