साथ ही कहा कि निजी संपत्ति या घर में व्यक्तिगत और सीमित धार्मिक गतिविधियों की अनुमति है। उसे बड़े स्तर पर सामूहिक धार्मिक स्थल में बदलने की छूट नहीं दी जा सकती। संविधान धार्मिक स्वतंत्रता देता है, लेकिन यह अधिकार असीमित नहीं है। यदि किसी धार्मिक कार्य से जीवन, यातायात, शांति या सामाजिक सौहार्द खराब होता है तो राज्य को उसे नियंत्रित करने का अधिकार है।
कोर्ट ने कहा कि निजी संपत्ति या घर में व्यक्तिगत और सीमित पूजा अर्चना संविधान के तहत संरक्षित है। यदि वही स्थान नियमित रूप से बड़ी संख्या में लोगों के लिए धार्मिक स्थल के रूप में इस्तेमाल होने लगे तो वह सार्वजनिक प्रभाव वाला मामला बन जाता है और उसपर प्रशासनिक नियंत्रण लागू हो सकता है।
कोर्ट ने पाया कि जिस जमीन पर याचिकाकर्ता मालिकाना हक जता रहा था, वह वास्तव में राजस्व रिकॉर्ड में आबादी भूमि के रूप में दर्ज है। प्रशासन की रिपोर्ट के अनुसार उस स्थान पर केवल ईद के अवसर पर ही नमाज अदा की जाती थी, जबकि याची अब वहां नियमित सामूहिक नमाज शुरू करने की कोशिश कर रहा था। कोर्ट ने कहा कि किसी नई परंपरा को शुरू करना जो सामाजिक सद्भाव को प्रभावित करे, सांविधानिक संरक्षण के दायरे में नहीं आता।