आरोप लगा कि स्वर्ण जयंती स्वरोजगार योजना के अंतर्गत वर्ष 2003-2004 में बिना टेंडर निकाले ही किताबों के प्रकाशन और उनकी सामग्रियों की खरीद कर ली गई। 21.85 लाख रुपये सरकारी धन का दुरुपयोग किया गया। 14 साल तक चली जांच के बाद आईएएस अरविंद सिंह समेत पांचों आरोपियों के खिलाफ वर्ष 2020 में आरोप पत्र दाखिल हुआ। इसका संज्ञान लेते हुए कौशाम्बी की भ्रष्टाचार निरोधी विशेष अदालत ने 2021 में सभी आरोपियों के विरुद्ध तलबी आदेश जारी किया था।
इस आपराधिक कार्यवाही को चुनौती देते हुए याचीगण ने अग्रिम जमानत अर्जी हाईकोर्ट में दाखिल की थी। परियोजना निदेशक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता वीपी श्रीवास्तव ने दलील दी कि याची ने किताबों का प्रकाशन और छपाई सामग्री की खरीद शासनादेश के अनुरूप की थी। विभागीय जांच में मात्र 21 लाख 85 हजार की अनियमितता पाई गई थी। आरोप सिर्फ छपाई और खरीद बिना टेंडर के होने का लगा। विभागीय जांच के दौरान ही आपराधिक कार्यवाही शुरू कर दी गई, जो न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
उर्दू अनुवाद के अधिवक्ता ने दलील दी कि याची को नाजिर का अतिरिक्त कार्यभार सौंपा गया था। वह मात्र नोट शीट बनाता था। उसे खरीद के लिए अधिकृत नहीं किया गया था। कोर्ट ने आपराधिक कार्यवाही को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। हालांकि, तीनों के प्रार्थना पत्र पर सशर्त अग्रिम जमानत मंजूर कर ली।