इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि सरकारी राशन की दुकान का लाइसेंस सिर्फ एफआईआर दर्ज होने के आधार पर रद्द या निलंबित नहीं किया जा सकता है। यह टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने सभी दुकानों के लाइसेंस तत्काल बहाल करने का निर्देश दिया। यह आदेश न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया की पीठ ने मोहम्मद शाहिद, यातिश कुमार, धर्मेंद्र कुमार, राजकुमार, वेदपाल सहित 22 याचिकाकर्ताओं की याचिका पर दिया।
मेरठ, मुरादाबाद, बिजनौर, गाजियाबाद, अमरोहा और आगरा के रहने वाले याचियों के पास सरकारी राशन की दुकान का लाइसेंस था। जिला आपूर्ति अधिकारी ने आवश्यक वस्तु अधिनियम और धोखाधड़ी के आरोप में दर्ज मुकदमे के आधार पर लाइसेंस रद्द कर दिया। याचियों की अपील आयुक्त ने भी खारिज कर दी। इसके खिलाफ याचियों ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर लाइसेंस रद्द किए जाने के आदेश को चुनौती दी।
याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने दलील दी कि उपस्थिति में जांच अधिकारी ने राशन कार्डधारकों के बयान दर्ज नहीं किए थे और न ही उन्हें गवाहों से जिरह करने के लिए सुनवाई का अवसर प्रदान किया गया था। दुकानदार के खिलाफ कोई पूर्ण जांच नहीं की गई है और न ही उन्हें आरोप पत्र दिए गए। कहा कि सरकारी राशन की दुकान का लाइसेंस केवल इस आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता है कि याचिकाकर्ता के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है।
शासकीय अधिवक्ता ने दलील दी कि याचियों ने आवश्यक वस्तुओं के वितरण के संबंध में अनियमितता की, इसलिए लाइसेंस रद्द कर दिया गया है। इसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है और याचिका खारिज होने योग्य है। न्यायालय ने बजरंग तिवारी मामले में फुल बेंच के फैसले और अमित कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य मामले में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए सभी याचिकाएं स्वीकार कर ली। न्यायालय ने कहा कि पांच अगस्त 2019 के सरकारी आदेश से पता चलता है कि लाइसेंस रद्द करने से पहले प्रारंभिक जांच की जानी चाहिए। अधिकारियों ने निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया है। कोर्ट ने जिला आपूर्ति अधिकारी और अपीलीय प्राधिकरणों के पारित रद्दीकरण के आदेशों को रद्द कर दिया।