भरण-पोषण संबंधी याचिका की सुनवाई के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पारिवारिक न्यायालय को छह माह में निस्तारण का निर्देश दिया है। साथ ही आठ हजार रुपये गुजारा भत्ता दिलाने के लिए विधिक कार्रवाई की बात कही। कोर्ट ने कहा कि न्यायालय या पीठासीन अधिकारी ही किसी मामले के विचारण या निपटान में हितधारक नहीं हैं। पुलिस और निष्पादन अधिकारी, अधिवक्ता, मामले के पक्षकार, कर्मचारी भी इस आदेश से आबद्ध हैं। निस्तारण में न्यायालय को हर तरह से सहायता प्रदान करना सबकी जिम्मेदारी है। यह आदेश जस्टिस नलिन कुमार श्रीवास्तव की अदालत ने याची शिमला चाैधरी की याचिका पर दिया।
याची की शादी दो मई 2018 को रमाशंकर निवासी करछना, प्रयागराज के साथ हुई थी। शादी के एक साल बाद से ही विवाद होने के कारण याची अपने मायके में रह रही है। पीड़िता ने भरण-पोषण के लिए पारिवारिक न्यायालय में वाद दाखिल किया था। कोर्ट ने इस मामले में पीड़िता के पति को आठ हजार रुपये प्रति माह गुजारा भत्ता देने का आदेश 16 अगस्त 2024 को दिया। पति ने एक-दो माह गुजारा भत्ता देने के बाद बंद कर दिया, जिसके खिलाफ पीड़िता ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। सुनवाई के बाद कोर्ट ने छह माह के भीतर भरण पोषण वाद का निस्तारण करने और पीड़िता को गुजारा भत्ता दिलाने का निर्देश दिया।
किडनी की बीमारी से ग्रसित पीड़िता कोर्ट के लगा रही चक्कर
मार्च-2023 से पीड़िता को हफ्ते में दो बार स्वरूपरानी अस्पताल में डायलिसिस कराना पड़ रहा है। पीड़िता के पिता अग्निशमन विभाग में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थे, जो अब रिटायर हो गए हैं। पीड़िता की मां की मृत्यु हो चुकी है। इन परिस्थितियों में आर्थिक तंगी झेल रही पीड़िता को अस्पताल के साथ ही कोर्ट के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। दूसरी ओर पिता देवी प्रसाद का कहना है कि डायलिसिस में हर महीने 20-25 हजार रुपये खर्च होते हैं। किडनी की बीमारी तीसरी स्टेज में होने के कारण 10 हजार का हर महीने एक अलग से इंजेक्शन भी लगता है। इतना खर्च पेंशन से उठा पाना बहुत मुश्किल है।