यह टिप्पणी न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा व न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की खंडपीठ ने अलीगढ़ निवासी चंदन सिंह व अन्य की याचिका पर की। न्यायालय ने कहा कि कोई भी कानून जो पूर्व कानून की जगह पर लागू होता है, वह किसी पक्ष के लिए पूर्व के कानून से मिले उपायों को प्रभावित नहीं करेगा। पूर्व कानून मुकदमा दायर करने के दौरान जिस रूप में था उसी तरह वह वादी के लिए बरकरार रहेगा।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 के लागू होने से पहले उप्र जमींदारी एवं भूमि सुधार अधिनियम 1950 के तहत दायर वादों के आदेशों के खिलाफ पुनरीक्षण दायर किया जा सकता है। इसमें राजस्व संहिता बाधक नहीं है।
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यह टिप्पणी न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा व न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की खंडपीठ ने अलीगढ़ निवासी चंदन सिंह व अन्य की याचिका पर की। न्यायालय ने कहा कि कोई भी कानून जो पूर्व कानून की जगह पर लागू होता है, वह किसी पक्ष के लिए पूर्व के कानून से मिले उपायों को प्रभावित नहीं करेगा। पूर्व कानून मुकदमा दायर करने के दौरान जिस रूप में था उसी तरह वह वादी के लिए बरकरार रहेगा।
उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम 1950 के तहत दायर एक मुकदमे में पारित 19 अगस्त 2014 के आदेश के विरुद्ध दाखिल पुनरीक्षण की वैधता के लिए डबल बेंच को भेजा गया था।
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याची के अधिवक्ता विशाल खंडेलवाल ने दलील दी कि 11 फरवरी 2016 को उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता लागू हुई थी। ऐसे में जो केस 11 फरवरी 2016 से पहले जमींदारी अधिनियम के तहत चल रहे थे उनके आदेशों पर जमींदारी अधिनियम के प्रावधान ही लागू होंगे, राजस्व परिषद के नहीं। वहीं, प्रतिवादियों के वकील ने इसका विरोध करते हुए अपना पक्ष रखा।
न्यायालय ने पक्षों को सुनने के बाद स्पष्ट किया कि राजस्व संहिता के लागू होने से पहले उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम के तहत दायर वादों पर संहिता का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। याचिकाकर्ता ने जो पुनरीक्षण दायर किया है, वह दायर किया जा सकता था।