पुलिस महकमे ने तीन हजार से अधिक आरक्षियों की हेडकांस्टेबल पद पर प्रोन्नति बिना कोई वजह बताए रोक दी है। इसे लेकर सूबे के तमाम जिलों से आरक्षी हाईकोर्ट की शरण में आए हैं। उनका कहना है कि नियमानुसार सबकुछ सही होने और प्रोन्नति की सभी शर्तों को पूरा करने के बावजूद विभाग ने उनका प्रमोशन नहीं किया, जबकि उनसे जूनियर आरक्षियों को प्रोन्नति दे दी गई है।
गाजियाबाद, नोएडा, बुलंदशहर, बनारस, गोरखपुर आदि जिलों से शिवदास यादव सहित करीब 40 याचिकाओं पर न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने एक साथ सुनवाई की। याचीगण की ओर से अधिवक्ता विजय गौतम ने पक्ष रखा। याचिका में कहा गया कि 36513 आरक्षियों की वरिष्ठता सूची 29 नवंबर 2017 को जारी की गई थी। विभाग ने इसमें से 29598 आरक्षियों को हेडकांस्टेबल के पद पर प्रोन्नत कर दिया। 835 लोगों का मामला सील कवर लिफाफे में बंद कर दिया गया और 582 का सर्विस रिकॉर्ड उपलब्ध न होने के कारण प्रोन्नति नहीं दी गई। सूची में शेष 3780 आरक्षियों को प्रोन्नति नहीं दी गई और न ही ऐसा करने का कोई कारण बताया गया।
अधिवक्ता की दलील थी कि याचीगण 30 जून 1993 और चार मई 1995 के शासनादेशों में दी गई शर्तों को पूरा करते हैं। इसके मुताबिक हेडकांस्टेबल पद पर प्रोन्नति के सात वर्ष की सेवा होनी चाहिए और प्रोन्नति से पूर्व पांच वर्ष की समयावधि में आरक्षी के विरुद्ध कोई विभागीय या दंडात्मक कार्रवाई न की गई हो। सेवा नियमावली में यह भी नियम है कि कोई भी दंडात्मक कार्रवाई पांच वर्ष के बाद प्रभावहीन हो जाती है और प्रोन्नति पर उसका प्रभाव नहीं पड़ता है। याचीगण इन सभी शर्तों को पूरा करते हैं। कोर्ट ने चेयरमैन पुलिस भर्ती बोर्ड को निर्देश दिया है कि याचीगण की प्रोन्नति पर नियमानुसार विचार कर निर्णय लिया जाए।