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UP : हाईकोर्ट का आदेश- तलाशी और जब्ती की वीडियोग्राफी अनिवार्य, डीजीपी जारी करें एसओपी

Wed, 07 Jan 2026 01:58 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि तलाशी और जब्ती की प्रक्रिया में ऑडियो-वीडियो की रिकॉर्डिंग अनिवार्य है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा-105 और उत्तर प्रदेश भारतीय नागरिक सुरक्षा नियमावली-2024 के तहत तलाशी, बरामदगी और जब्ती की वीडियोग्राफी आवश्यक है।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि तलाशी और जब्ती की प्रक्रिया में ऑडियो-वीडियो की रिकॉर्डिंग अनिवार्य है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा-105 और उत्तर प्रदेश भारतीय नागरिक सुरक्षा नियमावली-2024 के तहत तलाशी, बरामदगी और जब्ती की वीडियोग्राफी आवश्यक है। इसे ई-साक्ष्य पोर्टल पर अपलोड किया जाना चाहिए। कोर्ट ने इस व्यवस्था को प्रभावी रूप से लागू करने के लिए पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) जारी करने का निर्देश दिया है।

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यह आदेश न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ ने शादाब की जमानत अर्जी पर दिया है। मुजफ्फरनगर के मंसूरपुर थाने में याची शादाब पर विभिन्न धाराओं में प्राथमिकी दर्ज की गई थी। अभियोजन का दावा था कि आरोपी और अन्य सह-आरोपियों के पास से 40 बाइक बरामद की गई थीं। आरोपी ने जमानत के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

अधिवक्ता ने दलील दी कि याची को मामले में झूठा फंसाया गया है और सह आरोपियों को पहले ही जमानत मिल चुकी है। साथ ही यह भी दलील दी कि नियमानुसार बरामदगी की वीडियोग्राफी नहीं कराई गई है। इससे मामला संदिग्ध प्रतीत होता है। वहीं, कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा कि बीएनएसएस की धारा-105 के तहत तलाशी और जब्ती की प्रक्रिया की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग अब वैकल्पिक नहीं, बल्कि अनिवार्य है।
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इसके अलावा नियमावली के अनुसार ऐसी रिकॉर्डिंग को केस डायरी का हिस्सा बनाकर 48 घंटे के भीतर संबंधित मजिस्ट्रेट को भेजा जाना चाहिए। इन प्रावधानों का पालन न होने से अभियोजन की पूरी कहानी संदेह के घेरे में आ जाती है। इससे निर्दोष व्यक्तियों को झूठी बरामदगी में फंसाए जाने की आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने मामले की परिस्थितियों, सह-आरोपियों को पहले से मिली जमानत, आरोपी की लंबी हिरासत और जेलों में बढ़ती भीड़ को ध्यान में रखते हुए शादाब को सशर्त जमानत दे दी। वहीं, कोर्ट ने पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया कि वे इस संबंध में एसओपी जारी करें और जो अधिकारी इन अनिवार्य प्रावधानों का पालन नहीं कर रहे हैं, उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।

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