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हाईकोर्ट : इंश्योरेंस कंपनी को 33.50 लाख रुपये की क्षतिपूर्ति देने का आदेश

Wed, 15 Dec 2021 08:35 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

डॉ. अनूप कुमार भट्टाचार्य व अन्य बनाम नेशनल इंश्योरेंश कंपनी व अन्य पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि याची ने जिस दिन प्राधिकरण में दावे के लिए याचिका दाखिल की थी, उस दिन से कंपनी को ब्याज देना होगा।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नेशनल इंश्योरेंस कंपनी को 33.50 लाख रुपये की क्षतिपूर्ति देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि यह रकम दो महीने के भीतर आठ फीसदी ब्याज की दर से देनी होगी। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सुनीता अग्रवाल और न्यायमूर्ति कृष्ण पहल की दो जजों की खंडपीठ कर रही थी।

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डॉ. अनूप कुमार भट्टाचार्य व अन्य बनाम नेशनल इंश्योरेंश कंपनी व अन्य पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि याची ने जिस दिन प्राधिकरण में दावे के लिए याचिका दाखिल की थी, उस दिन से कंपनी को ब्याज देना होगा। मामले में मोटर वाहन दावा प्राधिकरण ने अपने आदेश में दो लाख 30 हजार 400 रुपये के दावा भुगतान का आदेश दिया था और इंश्योरेंश कंपनी को आठ फीसदी ब्याज की दर से रकम का भुगतान करने को कहा था। लेकिन हाईकोर्ट ने प्राधिकरण के आदेश को पूरी तरह से बदल दिया। उसने दावा राशि को दो लाख, 30 हजार, 400 रुपये को बढ़ाकर 33 लाख, 50 हजार रुपये कर दी। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि क्षतिपूर्ति की रकम को ब्याज दावा प्राधिकरण में दाखिल दावा याचिका के दिन से देना होगा।

मामला बरेली जिले के मीरगंज थाने का है। याची डॉ. अनूप कुमार भट्टाचार्य के बेटे अभिषेक भट्टाचार्य की 20 जुलाई 2004 में मोटर दुर्घटना में मौत हो गई थी। याची ने इंश्योरेंश कंपनी के खिलाफ याचिका दाखिल की थी। मामले में सुनवाई करते हुए मोटर वाहन दुर्घटना प्राधिकरण ने 24 जनवरी 2000 को याची को दो लाख, 30 हजार, 400 रुपये की क्षतिपूर्ति देने का आदेश पारित किया था। मामले की सुनवाई केदौरान याची डॉ. अनूप कुमार भट्टाचार्य की भी मौत हो गई। इसके बाद याची की पत्नी लीना भट्टाचार्य ने याचना जारी रखी। याची ने प्राधिकरण के इस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी।

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प्राधिकरण ने मृतक की गलती मानते हुए क्षतिपूर्ति की राशि कम कर दी थी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए कुल पांच बिंदुओं पर विचार किया। याची की तरफ से तर्क दिया गया कि प्राधिकरण ने गवाहों के बयानों पर ध्यान नहीं दिया और घटना में मृतक की भी गलती मानते हुए क्षतिपूर्ति की राशि को कम कर दिया। इसके साथ ही एफआईआर और पुलिस रिकार्ड को भी नजरअंदाज किया गया। मासिक आय केदस्तावेजों को साक्ष्य न मानकर गलती की है। प्रतिवादी के अधिवक्ता ने कहा कि प्राधिकरण ने गवाहों के बयानों पर भरोसा न करके कोई गलती नहीं की है।

याची की ओर से मृतक का उपचार किस हॉस्पिटल में हुआ इसकी जानकारी भी नहीं दी गई। इसके अलावा आरोपपत्र पर गवाहों के नाम उल्लिखित नहीं हैं, जिसके कारण घटनास्थल पर उनकी उपस्थिति संदेहास्पद है। लेकिन, कोर्ट ने प्रतिवादी के तर्कों को नहीं माना और कहा कि घटना में मृतक की कोई गलती नहीं थी। दुर्घटना ट्रक ड्राइवर की लापरवाही के कारण हुई है। अत: प्राधिकारण ने क्षतिपूर्ति की जो राशि अवार्ड की, वह समुचित नहीं है। लिहाजा, कोर्ट ने क्षतिपूर्ति की दो लाख, 30 हजार, 400 रुपये की धनराशि को बढ़ाकर 33 लाख, 50 हजार रुपये कर दी । 
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