इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि केवल अपील या पुनरीक्षण लंबित होने के आधार पर किसी आदेश के क्रियान्वयन पर रोक नहीं लगाई जा सकती। इसके लिए संबंधित अपीलीय या पुनरीक्षण अदालत से अंतरिम राहत प्राप्त करनी होगी। यह टिप्पणी मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली, न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने कुशीनगर के बहारन प्रसाद व पांच अन्य की ओर से दाखिल लीव टू अपील की अर्जी और विशेष अपील का निस्तारण करते हुए की।
मामला एकल पीठ के राजस्व मामले में पारित आदेश से जुड़ा था। एकल पीठ ने संबंधित एसडीएम को रिट याचिकाओं के समूह में पारित आदेशों को चार सप्ताह में लागू करने का आदेश दिया था। अपीलकर्ताओं का कहना था कि वे मामले में आवश्यक पक्षकार हैं और सीमांकन आदेश से प्रभावित हो रहे हैं। आदेश वापस लेने की उनकी अर्जी खारिज हो चुकी थी। इसके खिलाफ अपील भी खारिज हुई और पुनरीक्षण लंबित था।
कोर्ट ने पाया कि लंबित अपील या पुनरीक्षण में किसी अदालत ने अंतरिम रोक नहीं लगाई है। ऐसे में आदेश के क्रियान्वयन पर रोक का आधार नहीं है। कोर्ट ने कहा कि इस स्तर पर पक्षकार होने के अधिकार पर कोई निष्कर्ष देना लंबित पुनरीक्षण को प्रभावित कर सकता है। लिहाजा, कोर्ट ने दोनों अर्जियों का निस्तारण कर अपीलकर्ताओं को संबंधित अदालत में अंतरिम राहत मांगने की स्वतंत्रता दी है।