इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 41 साल पुराने हत्याकांड में दोषी को मिली उम्रकैद की सजा बरकरार रखी। कहा, हत्या जैसे जघन्य मामलों में घायल गवाहों की गवाही में मामूली विरोधाभास से पूरी गवाही अविश्वसनीय नहीं माना जा सकती है। यह फैसला न्यायमूर्ति सलिल कुमार राय, न्यायमूर्ति पदम नारायण मिश्र की खंडपीठ ने असगर व अन्य की अपील पर सुनाया है। मामला बिजनौर के चांदपुर थाना क्षेत्र में 18 दिसंबर 1985 को हुए हत्याकांड से जुड़ा है। अभियोजन के अनुसार आरोपियों ने मामन हुसैन, उनके बेटे जाहिद, पत्नी शरीफन पर धारदार हथियार व लाठी से हमला किया था। गंभीर चोटों से मामन हुसैन की 23 दिसंबर 1985 को मौत हो गई थी।
ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ असगर व उसके साथियों ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की। अपील के दौरान असगर और एक अन्य की मौत हो गई। लिहाजा, कोर्ट ने जीवित बचे जबीर की अपील पर सुनवाई की। जबीर के अधिवक्ता ने गवाहों के बयानों में विरोधाभास, स्वतंत्र गवाहों की गैरहाजिरी और हत्या के कारण साबित नहीं होने को आधार बनाया।
कोर्ट ने पाया कि ट्रायल के दौरान हमले में मरने वाले के घायल बेटे जाहिद और पत्नी शरीफन ने गवाही दी थी। उन्होंने घटना की पुष्टि की थी। कोर्ट ने कहा कि घटना में घायल प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही विश्वसनीय है। मामूली विरोधाभास के आधार पर उनकी पूरी गवाही को दर नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। उन्हें आईं चोटें मेडिकल साक्ष्य से समर्थित हैं। इसलिए किसी अन्य गवाह की गवाही नहीं होने से अभियोजन का मामला कमजोर नहीं होता।
कोर्ट ने कहा कि जब प्रत्यक्ष साक्ष्य भरोसेमंद हो तो घटना की वजह का कमजोर या साबित न होना निर्णायक नहीं होता। सभी आरोपियों के हथियारों से लैस होकर साथ आने और हमले में सक्रिय भागीदारी से साझा मंशा भी साबित होती है। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द करने से इन्कार कर अपील खारिज कर दी। साथ ही जबीर की सजा बरकरार रखते हुए उसे 20 सितंबर तक ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया है।