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हाईकोर्ट का आदेश : हत्या नहीं मॉब लिंचिंग का मामला प्रतीत होता है, रोकी जाए पुलिस की विवेचना

Sun, 13 Jul 2025 07:37 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक कथित मॉब लिंचिंग मामले में चल रही पुलिस जांच पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने कहा कि दलीलों और जांच अधिकारी के शपथपत्र से मामला मॉब लिंचिंग का प्रतीत होता है।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक कथित मॉब लिंचिंग मामले में चल रही पुलिस जांच पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने कहा कि दलीलों और जांच अधिकारी के शपथपत्र से मामला मॉब लिंचिंग का प्रतीत होता है। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को ''तहसीन एस. पूनावाला बनाम भारत संघ'' मामले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से निर्धारित दिशानिर्देशों के अनुपालन में तीन सप्ताह में एक विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना की खंडपीठ मोहम्मद आलम की याचिका पर दिया।
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मुरादाबाद के थाना मझोला क्षेत्र में याची के भाई की कथित रूप से भीड़ ने हत्या कर दी थी। पुलिस मुकदमा दर्ज कर जांच कर रही है। इसके खिलाफ मृतक के भाई ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर मामले की जांच एसआईटी से कराने की मांग की। साथ ही याचिका में सुप्रीम कोर्ट के ''तह्सीन एस. पूनावाला बनाम भारत संघ'' मामले में मॉबलिंचिंग के संबंध में दिए गए निर्देशों का अनुपालन करने की भी प्रार्थना की गई।

याचिकाकर्ता के वकील सैयद अली मुर्तजा ने दलील दी कि यह मामला मॉब लिंचिंग का है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि ''तहसीन एस. पूनावाला'' मामले के दिशानिर्देश सभी अधिकारियों पर बाध्यकारी हैं। इसका अनुपालन किया जाए। कोर्ट ने दलीलों को सुनने व जांच अधिकारी के जवाबी हलफनामा का अवलोकन करने के बाद कहा कि मामला मॉब लिंचिंग का प्रतीत होता है। कोर्ट ने अगली सुनवाई की तारीख पांच अगस्त तक जांच पर रोक लगा दी।
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मॉब लिंचिंग पर तहसीन पूनावाला मामले में सु्प्रीम कोर्ट का निर्देश

याची अधिवक्ता सैय्यद अली मुर्तजा ने दलील दी है कि सुप्रीम कोर्ट ने तहसीन पूनावाला मामले में मॉब लिंचिंग को लेकर कई निर्देश दिए हैं। इनमें एफआईआर तुरंत दर्ज करना, नोडल अधिकारी की ओर से जांच की व्यक्तिगत निगरानी, पीड़ितों के लिए मुआवजा योजना तैयार करना, ऐसे मामलों के लिए विशेष अदालतों/फास्ट ट्रैक कोर्ट की ओर से सुनवाई, अधिकतम सजा का प्रावधान, गवाहों की सुरक्षा के उपाय और पीड़ितों को मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान करना शामिल है।
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