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हाईकोर्ट का आदेश : पति से अनबन पर नहीं दे सकते गर्भपात की अनुमति, अजन्मे बच्चे को भी जीने का मौलिक अधिकार

Wed, 07 Oct 2026 11:37 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

High Court News : पति-पत्नी के बीच सामान्य अनबन को गर्भ में पल रहे बच्चे का जीवन समाप्त करने का आधार नहीं माना जा सकता। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मां की शारीरिक स्वायत्तता के साथ अजन्मे बच्चे के जीवन के मौलिक अधिकार की भी रक्षा जरूरी है। भदोही की 24 वर्षीय महिला ने पति और ससुरालवालों पर प्रताड़ना के आरोप लगाते हुए 20 सप्ताह के गर्भ को समाप्त करने की अनुमति मांगी थी, लेकिन स्वस्थ भ्रूण और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने याचिका खारिज कर दी। 

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इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक।
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विस्तार
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि मां की शारीरिक स्वायत्तता के साथ-साथ गर्भ में पल रहे अजन्मे बच्चे को भी जीने का मौलिक अधिकार प्राप्त है। ऐसे में पति-पत्नी के बीच सामान्य अनबन के आधार पर गर्भ में पल रहे बच्चे को समाप्त करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।

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इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति जेजे मुनीर व न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने गर्भपात की मांग में पत्नी की ओर से दायर याचिका खारिज कर दी। भदोही निवासी 24 वर्षीय युवती का विवाह मई 2026 में यूपी पुलिस के एक सिपाही से हुआ था। महिला ने पति, ससुरालवालों पर शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना सहित कई आरोप लगाते हुए गर्भपात की अनुमति देने की मांग में याचिका दायर की थी।

महिला का कहना था कि अब वह बच्चे को जन्म नहीं देना चाहती है। यह भी कहा कि वह बेरोजगार है और आर्थिक तंगी के चलते बच्चे का पालन नहीं कर पाएगी। इसलिए उसे 20 सप्ताह के इस गर्भ को समाप्त करने की अनुमति दी जाए। वहीं, सिपाही पति ने पत्नी के आरोप को खारिज कर दिया। उसने कोर्ट के सामने हलफनामा दिया कि वह अपनी पत्नी और आने वाले बच्चे की पूरी जिम्मेदारी उठाने के लिए पूरी तरह तैयार है।

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पति को 12 हजार रुपया प्रतिमाह पत्नी को देने का दिया आदेश

कोर्ट ने मेडिकल रिपोर्ट में पाया कि 17 सप्ताह से अधिक का भ्रूण पूरी तरह स्वस्थ है। हाईकोर्ट ने केरल हाईकोर्ट के एक निर्णय का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि गर्भ में पल रहे बच्चे का अपना अस्तित्व और जीवन का अधिकार होता है। जब तक मां के स्वास्थ्य या जीवन को गंभीर खतरा न हो या भ्रूण में कोई जानलेवा बीमारी न पाई जाए, तब तक अजन्मे बच्चे के जीने का अधिकार मां की व्यक्तिगत पसंद पर भारी पड़ेगा।

मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) रूल्स 2003 के नियम के तहत 20 से 24 सप्ताह के बीच गर्भपात की अनुमति केवल विशेष श्रेणियों, जैसे दुष्कर्म पीड़ित, नाबालिग या गर्भावस्था के दौरान पति की मृत्यु या तलाक के कारण वैवाहिक स्थिति बदलने के मामलों में ही दी जाती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति-पत्नी के बीच सामान्य कलह पर गर्भपात की अनुमति नहीं दे सकते। कोर्ट ने पति के 40 हजार रुपये के मासिक वेतन में से 12 हजार रुपये प्रति माह पत्नी को देने का आदेश दिया है।
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