इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल एक या दो आपराधिक मामलों के लंबित होने के आधार पर किसी को गुंडा घोषित नहीं किया जा सकता। यह शब्द समाज में गहरा कलंक और बदनामी जुड़ा होता है। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकल पीठ ने बुलंदशहर निवासी सत्येंद्र की याचिका पर की। कहा कि बिना पर्याप्त ठोस आधार के ऐसी कार्रवाई व्यक्ति और उसके परिवार की प्रतिष्ठा को अपूरणीय क्षति पहुंचाती है। याची के खिलाफ खुर्जा नगर थाने में 2022 और 2023 में मारपीट व एससी/एसटी एक्ट से संबंधित दो मामले दर्ज थे।
इसी आधार पर गुंडा एक्ट की कार्रवाई कर उसे छह महीने के लिए जिले से निष्कासित कर दिया गया था। याची ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। कोर्ट ने याचिका को स्वीकार कर याची के खिलाफ जारी जिला बदर के आदेश को रद्द कर दिया।
गुंडा तभी माना जा सकता है, जब वह आदतन अपराधी हो
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गुंडा अधिनियम की धारा 2(बी)(आई) के तहत किसी को गुंडा तभी माना जा सकता है, जब वह आदतन अपराधी हो। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला दिया। कहा, केवल दो मुकदमों के आधार पर किसी को आदतन अपराधी नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने पाया कि वर्तमान मामले में अधिकारियों ने बिना स्वतंत्र न्यायिक दिमाग लगाए और बिना पर्याप्त साक्ष्यों के याची को गुंडा घोषित कर दिया था, जो कानूनन गलत है।