इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि मुकदमे की कार्यवाही में देरी होने से सीआरपीसी की धारा 311 के तहत दाखिल अर्जी को रद्द नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा मंजू देवी के मामले में दिए गए फैसले का उदाहरण देते हुए निचली अदालत को गवाहों को बुलाकर परीक्षण का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि छह महीने की समयावधि में यह गवाही पूरी कर ली जाए। यह आदेश न्यायमूर्ति शेखर कुमार यादव की खंडपीठ ने मधुसूदन शुक्ला की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया।
कोर्ट ने कहा कि विवादित मामले की उम्र अपने आप में मामले की निर्णायक नहीं हो सकती है। भौतिक गवाह केपरीक्षण के लिए प्रार्थना की गई है तो उसे रद्द नहीं किया जा सकता है, क्योंकि धारा 311 भौतिक गवाह को बुलाने या उपस्थित व्यक्ति की जांच करने की शक्ति से संबंधित है। कोई भी न्यायालय इस संहिता के तहत किसी भी जांच, परीक्षण या कार्यवाही के किसी भी चरण में, किसी भी व्यक्ति को गवाह के रूप में बुला सकता है। किसी भी व्यक्ति को दोबारा परीक्षण के लिए बुलाया जा सकता है और मामले में पहले की तरह जांच की जा सकती है। न्यायालय को समन का अधिकार है।