इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सहायक अध्यापक की सेवा समाप्ति से जुड़े मामले में डीआईओएस के आदेश को रद्द कर दिया है। प्रबंधन के भेजे गए प्रस्ताव पर विधिसम्मत विचार कर दोबारा निर्णय लेने का निर्देश दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकल पीठ ने कॉलेज प्रबंधन की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।
कॉलेज प्रबंधन ने सहायक अध्यापक मनोज कुमार के खिलाफ विद्यालय के व्हाट्सएप ग्रुप पर कथित अभद्र टिप्पणी को लेकर अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की थी। शिक्षक को निलंबित कर विभागीय जांच कराई थी। 24 फरवरी 2025 की जांच रिपोर्ट के आधार पर सेवा समाप्ति का प्रस्ताव डीआईओएस को भेजा था। मामले में कई याचिकाएं हाईकोर्ट में दायर की गई थीं।
एक याचिका में न्यायालय ने जांच शीघ्र पूरी करने का निर्देश दिया था। वहीं, दूसरी में डीआईओएस को सेवा समाप्ति के प्रस्ताव पर सुनवाई कर दो माह में निर्णय लेने को कहा गया था। साथ ही अंतरिम व्यवस्था के तहत शिक्षक को डीआईओएस कार्यालय में उपस्थिति दर्ज कराने और नियमानुसार वेतन देने का निर्देश दिया गया था।
डीआईओएस ने 18 नवंबर 2025 को पारित आदेश में सेवा समाप्ति के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। आदेश में कहा था कि व्हाट्सएप टिप्पणी के संबंध में पहले ही कठोर चेतावनी दी जा चुकी है। आरोप सेवा से बर्खास्तगी योग्य नहीं हैं। डीआईओएस ने इसे दंड के अनुपात से अधिक कठोर कार्रवाई माना।
कोर्ट ने कहा कि डीआईओएस को कानून के तहत जांच रिपोर्ट, साक्ष्य और प्रबंधन के प्रस्ताव पर स्वतंत्र रूप से विचार करना था पर आदेश में ऐसे किसी विश्लेषण का उल्लेख नहीं है। डीआईओएस ने अपने प्रत्युत्तर हलफनामे में जिन कानूनी प्रावधानों का उल्लेख किया, उनका समुचित अनुपालन आदेश में नहीं दिखता। साथ ही सेवा समाप्ति के प्रस्ताव पर विचार करते समय वैधानिक प्रावधानों के अनुसार ही निर्णय लिया जाना चाहिए। कोर्ट ने 18 नवंबर 2025 का आदेश निरस्त करते हुए मामला पुनः डीआईओएस कन्नौज को भेज दिया।