इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चुनावी रंजिश में दर्ज एससी-एसटी एक्ट के एक मामले को रद्द कर दिया। कहा कि आरोपों के समर्थन में साक्ष्य नहीं होने पर भी आपराधिक मुकदमा जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चुनावी रंजिश में दर्ज एससी-एसटी एक्ट के एक मामले को रद्द कर दिया। कहा कि आरोपों के समर्थन में साक्ष्य नहीं होने पर भी आपराधिक मुकदमा जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
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यह आदेश न्यायमूर्ति तेज प्रताप तिवारी की एकल पीठ ने बरेली निवासी सत्यप्रकाश की अपील स्वीकार करते हुए दिया। कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट के विशेष न्यायाधीश की ओर से जारी संज्ञान और समन आदेश को भी निरस्त कर दिया।
मामले के अनुसार, शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि राशन की दुकान के डीलर के चुनाव को लेकर हुए विवाद हुआ था। आरोप है कि याची ने उनके घर पहुंचकर जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया। वोट नहीं देने पर उनकी बेटी को घर से उठवा लेने की धमकी दी। शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि 17 जुलाई 2025 को उनकी अविवाहित बेटी लापता हो गई। इसके बाद याची के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज हुई ।
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युवती ने बयान में बताई अपनी मर्जी
याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि मुकदमा चुनावी रंजिश के कारण दर्ज हुआ था। युवती अपनी मर्जी से घर से गई थी। बाद में उसने अपनी पसंद से शादी कर ली। जांच के दौरान युवती ने अपने बयान में बताया कि वह एक युवक से प्रेम करती थी।
जातिसूचक अपमान के आरोप के समर्थन में नहीं मिले पर्याप्त साक्ष्य
हाईकोर्ट ने पाया कि एफआईआर में कथित जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल की तारीख, समय और वास्तविक शब्दों का स्पष्ट उल्लेख नहीं था। यह भी स्पष्ट नहीं था कि कथित घटना सार्वजनिक स्थान पर हुई थी या नहीं। कोर्ट को ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिला, जिससे यह साबित हो सके कि शिकायतकर्ता को उसकी जाति के आधार पर अपमानित किया गया था। जांच के दौरान अपहरण से संबंधित धारा भी हटा दी गई थी। युवती के बयान में आरोपी की भूमिका सामने नहीं आई।