इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि गवाह के मुकर जाने से गवाही को कूड़ा-कचरा मानकर फेंका नहीं जा सकता। गवाही का वह प्रासंगिक हिस्सा जो अन्य सुबूतों से मेल खाता है, सजा का आधार बन सकता है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि गवाह के मुकर जाने से गवाही को कूड़ा-कचरा मानकर फेंका नहीं जा सकता। गवाही का वह प्रासंगिक हिस्सा जो अन्य सुबूतों से मेल खाता है, सजा का आधार बन सकता है। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति नलिन कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने बुलंदशहर निवासी पति तेजवीर, ससुर नानकराम और सास मुन्नी देवी को ट्रायल कोर्ट से मिली उम्रकैद की सजा पर मुहर लगा दी।
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कोर्ट ने सुनवाई के दौरान गवाहों के बयानों का सूक्ष्म विश्लेषण किया। कहा कि मृतका की बहन और माता-पिता भले ही आरोपियों को बचाने के लिए उन्हें निर्दोष बता रहे हों पर उनकी जुबान से निकला एक-एक शब्द सच बयां कर रहा है। गवाहों ने बार-बार घटना शब्द का उच्चारण किया। हिंदी भाषी क्षेत्र में कोई भी व्यक्ति बीमारी को घटना नहीं कहता। बीमारी प्राकृतिक होती है, जबकि घटना अपराध की ओर इशारा करती है। गवाहों का यह कहना कि समझौता हो गया है, यह साबित करता है कि वे सच्चाई को छिपाने का प्रयास कर रहे हैं।
मामला बुलंदशहर के रामघाट क्षेत्र का है। 30 जुलाई 2019 को तेजवीर की पत्नी ममता की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। अलीगढ़ निवासी ममता की छोटी बहन चंद्रवती भी इसी घर में पति के दूसरे भाई के साथ ब्याही हैं। घटना के दिन चंद्रवती ने ही अपने पिता चोखेलाल को फोन कर बताया था कि उसके ससुरालवालों ने ममता को जबरन जहर पिला दिया है। अस्पताल ले जाते समय रास्ते में ममता की मौत हो गई थी। इसके बाद पति, सास और ससुर के खिलाफ दहेज हत्या के आरोप में एफआईआर दर्ज हुई।
विवेचना के बाद उनके खिलाफ ट्रायल कोर्ट ने आरोप पत्र लगा और 2021 में बुलंदशहर की सत्र अदालत ने गवाहों के मुकरने के कारण सभी को दहेज हत्या के आरोप से बरी कर दिया पर उन्हें हत्या का दोषी मानते हुए उम्रकैद और 10 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुना दी। इसके खिलाफ सभी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
आरोपियों की दलील
विवाहिता ने बीमारी के चलते अवसाद में की आत्महत्या
पति, सास और ससुर की ओर से दलील दी गई कि ममता अक्सर बीमार रहती थी और संतान न होने के कारण अवसाद में थी। बीमारी और मानसिक तनाव के कारण उसने खुद कीटनाशक पीकर आत्महत्या कर ली। मृतका के पिता और भाई ने खुद कोर्ट में कहा है कि आरोपी निर्दोष हैं और उन्होंने रंजिश में केस दर्ज कराया था। यही नहीं, घटना की सूचना देने वाली मुख्य चश्मदीद गवाह (बहन) ही मुकर गई तो सजा का कोई आधार नहीं बचता।
अभियोजन की दलील
अभियोजन की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता ने दलील दी कि मौत ससुराल के भीतर हुई और जहर जबरन पिलाया गया। इसकी सूचना मृतका की बहन ने फोन पर दी थी। एफआईआर घटना के तुरंत बाद दर्ज की गई थी, जिसमें आरोपियों के नाम और जहर पिलाने की बात स्पष्ट थी। गवाहों का मुकरना केवल सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है, ताकि वे अपने पारिवारिक रिश्तों को बचा सकें।
कोर्ट ने कहा कि साक्ष्य अधिनियम की धारा-101 के तहत आरोप साबित करने का भार अभियोजन पर होता है, लेकिन जब परिस्थितियां (जैसे घर के भीतर मौत और जहर की पुष्टि) आरोपियों के खिलाफ हों तो धारा-102 के तहत साक्ष्य का भार आरोपियों पर आ जाता है। मौजूदा मामले में आरोपी यह साबित करने में विफल रहे कि ममता के पास जहर कहां से आया और उन्होंने उसे अस्पताल क्यों नहीं पहुंचाया।
2.परिस्थितियों की अटूट श्रृंखला
कोर्ट ने कहा कि भले ही कोई सीधा चश्मदीद गवाह न बचा हो, लेकिन परिस्थितियों की कड़ी (जैसे- जहर की पुष्टि, इन-लॉज का मौके से भागना, और मृतका का अंतिम संस्कार मायके में होना) इतनी मजबूत है कि यह केवल आरोपियों के दोष की ओर इशारा करती है।