इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश गृह विभाग से स्पष्ट करने को कहा है कि जब दोनों हाथ या पैर से दिव्यांग को न्यायिक सेवा में अवसर दिया जा सकता है तो एपीओ (सहायक अभियोजन अधिकारी)-2025 भर्ती में क्यों नहीं। यह सवाल न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की एकल पीठ ने कानपुर नगर की दोनों हाथ व पैर से दिव्यांग श्रेया शुक्ला की याचिका पर किया।
मुख्य परीक्षा में शामिल करने से इन्कार करने पर श्रेया ने उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग(यूपीपीएससी) के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। उनके अधिवक्ता ने दलील दी कि विज्ञापन में लो विजन (कम दृष्टि वाले), हार्ड ऑफ हियरिंग (कम सुनने वाले) और वन आर्म (एक हाथ वाले) श्रेणियों को पात्र बताया गया है, लेकिन उसके साथ संलग्न दिव्यांगता प्रमाणपत्र (फॉर्म-4) में बीएलए श्रेणी भी शामिल है। मोहम्मद हैदर खान के मामले में इलाहाबाद की लखनऊ पीठ ने भी फैसला दिया था। इसके बावजूद श्रेया को बाहर कर दिया गया।
इस पर शासकीय अधिवक्ता ने दलील दी कि बीएलए श्रेणी विज्ञापन में निर्धारित पात्र उप-श्रेणियों में शामिल नहीं है। याची ने आवेदन पत्र में गलत उप-श्रेणी भर दी थी। इसकी वजह से वह प्रारंभिक परीक्षा में शामिल हो सकी। कोर्ट ने पूछा कि 30 जुलाई 2021 के शासनादेश में अन्य दिव्यांग उप-श्रेणियां क्यों शामिल नहीं की गईं। सरकार इसका जवाब दे।
वहीं, कोर्ट ने 28 जून से शुरू हो रही एपीओ मुख्य परीक्षा में अंतरिम रूप से अभ्यर्थी को शामिल होने की अनुमति दे दी है। साथ ही आयोग को भी निर्देश दिया है कि ऑनलाइन आवेदन संभव न हो तो याची से आवश्यक दस्तावेज संग मैनुअल फॉर्म भराएं। हालांकि, आयोग परिणाम घोषित न करने के लिए स्वतंत्र होगा। 11 अगस्त को अगली सुनवाई पर परिणाम सीलबंद लिफाफे में न्यायालय में प्रस्तुत किया जाएगा।
बीएलए श्रेणी
इसके अंतर्गत वे व्यक्ति आते हैं जिनके दोनों पैर और हाथ या भुजाएं किसी बीमारी, दुर्घटना या जन्मजात कारणों से प्रभावित या अक्षम हो गई हों।