इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मौजूदा न्यायाधीश के खिलाफ दाखिल आपराधिक अवमानना याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि सुनवाई के दौरान जज और वकील के बीच तीखी बहस अवमानना नहीं है। अधिवक्ता अरुण मिश्रा की अवमानना याचिका पर सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति सलिल कुमार राय और न्यायमूर्ति देवेंद्र सिंह प्रथम की अदालत ने स्पष्ट किया कि अदालत और वकील के बीच तीखी बहस होना किसी भी तरह से अदालत को कलंकित करना या न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप करना नहीं है। ऐसी बहस अवमानना के दायरे में नहीं आती।
यदि कोई न्यायाधीश कोई आदेश पारित करता है तो उसे ऊपरी अदालत में चुनौती दी जा सकती है लेकिन इसके लिए न्यायाधीश के विरुद्ध अवमानना की कार्यवाही नहीं चलाई जा सकती। मामले के मुताबिक याची अधिवक्ता का कहना है कि एक मामले की सुनवाई के दौरान उन्होंने संबंधित न्यायाधीश से यह कहते हुए मामले को रिलीज करने का अनुरोध किया था कि उन्हें संबंधित पीठ पर भरोसा नहीं है।
याची अधिवक्ता का आरोप है कि इस पर जज ने न केवल उन्हें अपमानित किया बल्कि याचिका खारिज कर बार काउंसिल को उनका नाम रोल से हटाने की सिफारिश भी कर दी।इसके खिलाफ याची ने संबंधित न्यायाधीश के खिलाफ आपराधिक अवमानना का मुकदमा शुरू करने की मांग की थी। हालांकि, कोर्ट ने मामले को पोषणीयता के आधार पर खारिज कर दिया।
इसके खिलाफ याची ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने की अनुमति मांगी। जिसे अदालत ने अस्वीकार्य कर दिया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस मामले में संविधान की व्याख्या या कानून का ऐसा कोई महत्वपूर्ण प्रश्न शामिल नहीं है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप की आवश्यकता हो।