इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि संयुक्त डिक्रीधारकों में से किसी एक की मृत्यु निष्पादन अर्जी दाखिल होने से पहले हो जाती है तो इससे पूरी कार्यवाही स्वतः शून्य नहीं हो जाती।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि संयुक्त डिक्रीधारकों में से किसी एक की मृत्यु निष्पादन अर्जी दाखिल होने से पहले हो जाती है तो इससे पूरी कार्यवाही स्वतः शून्य नहीं हो जाती। यदि जीवित संयुक्त डिक्रीधारक को पूरी डिक्री के निष्पादन का कानूनी अधिकार है तो मृत डिक्रीधारक का नाम हटाना या पक्षकारों का विवरण दुरुस्त करना प्रक्रियात्मक सुधार माना जा सकता है।
विज्ञापन
न्यायमूर्ति डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने यह टिप्पणी करते हुए निष्पादन कार्यवाही की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। मामला वर्ष 2003 में दाखिल बेदखली के मुकदमे से जुड़ा है। गाजियाबाद निवासी विनोद कुमार और अनिल कुमार के पक्ष में पांच जुलाई 2014 को डिक्री पारित की गई थी। पुनरीक्षण याचिकाओं के लंबित रहने के दौरान विनोद कुमार की मौत हो गई। 20 अक्तूबर 2023 को निष्पादन वाद दाखिल किया गया। इसमें दोनों मूल डिक्रीधारकों के नाम दर्ज थे।
हाईकोर्ट ने दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश 21 नियम 15 का उल्लेख करते हुए कहा कि जीवित संयुक्त डिक्रीधारक पूरी डिक्री के निष्पादन की मांग कर सकता है। संपत्ति के कथित हस्तांतरण की वैधता और प्रभाव का निर्धारण निष्पादन अदालत करेगी। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि निष्पादन की कार्यवाही कानून के अनुसार आगे बढ़ाई जाए।