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हाईकोर्ट ने उठाया सवाल : एक ही साक्ष्य को एक आरोप में अविश्वसनीय मानना तो दूसरे में स्वीकार करना उचित नहीं है

Sat, 17 Oct 2026 03:33 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 42 साल पुराने आपराधिक मामले में बांदा निवासी बलराम को दुष्कर्म के आरोप से बरी कर दिया है। न्यायमूर्ति अब्दुल शाहिद की एकल पीठ ने कहा कि एक ही साक्ष्य को एक आरोप में अविश्वसनीय मानना तो दूसरे में स्वीकार करना उचित नहीं है।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 42 साल पुराने आपराधिक मामले में बांदा निवासी बलराम को दुष्कर्म के आरोप से बरी कर दिया है। न्यायमूर्ति अब्दुल शाहिद की एकल पीठ ने कहा कि एक ही साक्ष्य को एक आरोप में अविश्वसनीय मानना तो दूसरे में स्वीकार करना उचित नहीं है। कोर्ट ने अधीनस्थ अदालत के फैसले को अवैध और विरोधाभासी मानते हुए रद्द कर दिया।

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बांदा के सहायक सत्र न्यायाधीश ने 20 जून 1984 को बलराम को दुष्कर्म के आरोप में चार साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी। हालांकि, इसी मामले में उसे अपहरण और युवती को भगाने के आरोपों से बरी कर दिया गया था। अभियोजन के अनुसार 22 जुलाई 1983 को युवती बाजार गई थी। इसके बाद वह लापता हो गई। वहीं, दो महीने बाद 23 सितंबर 1983 को मिली। याची ने ट्रायल कोर्ट की सजा को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। कोर्ट ने आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए दोषसिद्धि और सजा का आदेश निरस्त कर दिया। 

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