नियोक्ता ने इस निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया। कहा कि श्रम न्यायालय ने सुनवाई की गलत प्रक्रिया अपनाई है। उसने विभागीय जांच की वैधता और आरोपों के गुण-दोष पर एक साथ निर्णय दिया, जबकि पहले केवल विभागीय जांच की निष्पक्षता पर निर्णय होना चाहिए था। यदि विभागीय जांच वैध पाई जाती है तो उसी के आधार पर बर्खास्तगी का निर्णय कायम रहेगा। लेकिन यदि जांच दोषपूर्ण या अनुचित पाई जाती है तो नियोक्ता को श्रम न्यायालय के समक्ष स्वतंत्र साक्ष्य प्रस्तुत कर आरोप सिद्ध करने का अवसर दिया जाना अनिवार्य है। उसके बाद ही श्रम न्यायालय बर्खास्तगी की वैधता पर निर्णय दे सकता है।
वहीं, कर्मचारी के अधिवक्ता ने श्रम न्यायालय के निर्णय को सही बताया। हलांकि, कोर्ट ने कहा कि यदि विभागीय जांच निष्पक्ष और विधिसम्मत पाई जाती है तो सामान्यतः नियोक्ता को अतिरिक्त साक्ष्य प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं होती। सुप्रीम कोर्ट के वर्कमैन ऑफ मेसर्स फायरस्टोन टायर एंड रबर कंपनी ऑफ इंडिया (प्रा.) लिमिटेड के मामले में दिए फैसले का हवाला दिया। स्पष्ट किया कि विभागीय जांच की वैधता और निष्पक्षता का प्रश्न हमेशा प्रारंभिक मुद्दे के रूप में तय किया जाना चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि श्रम न्यायालय का विभागीय जांच को अनुचित ठहराने वाला निष्कर्ष सही है। उसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है, लेकिन आरोप सिद्ध न होने संबंधी निष्कर्ष कानून के विपरीत है।