इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जेल में बंद कर्मचारी को विभागीय कार्यवाही में जवाब देने का औपचारिक नहीं, वास्तविक अवसर मिलना चाहिए। इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति जेजे मुनीर की अदालत ने आगरा निवासी विनोद कुमार मिश्रा की बर्खास्तगी को अवैधानिक करार दिया है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जेल में बंद कर्मचारी को विभागीय कार्यवाही में जवाब देने का औपचारिक नहीं, वास्तविक अवसर मिलना चाहिए। इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति जेजे मुनीर की अदालत ने आगरा निवासी विनोद कुमार मिश्रा की बर्खास्तगी को अवैधानिक करार दिया है। साथ ही उसे सेवा में बहाल करने का आदेश दिया है।
विज्ञापन
कोर्ट ने कहा कि हिरासत में रहते किसी भी व्यक्ति के लिए विभागीय नोटिसों का जवाब देना या जांच में भाग लेना व्यावहारिक नहीं होता। भले ही उसके रिश्तेदारों को नोटिस दिया गया हो या अखबार में सूचना प्रकाशित की गई हो।
क्या है मामला
विनोद कुमार मिश्रा आगरा जिला सहकारी बैंक लिमिटेड में क्लर्क-कम-कैशियर के पद पर कार्यरत थे। पांच सितंबर 2021 को कुल्लू (हिमाचल प्रदेश) में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने उन्हें एनडीपीएस एक्ट के तहत गिरफ्तार किया था। मुकदमा लंबा चला। 28 जून 2024 को उन्हें विशेष न्यायाधीश, कुल्लू की अदालत ने बरी कर दिया।
विज्ञापन
इस दौरान बैंक ने उन्हें ‘अनधिकृत अनुपस्थिति’ का दोषी मानते हुए विभागीय जांच शुरू की और 28 दिसंबर 2023 को सेवा से बर्खास्त कर दिया। इसके खिलाफ याची ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
याची की दलील
याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि कर्मचारी जेल में रहते हुए विभागीय जांच में शामिल नहीं हो सकता था। उसे कोई वास्तविक अवसर नहीं दिया गया।
कोर्ट की टिप्पणी
‘सुनवाई का अवसर’ केवल औपचारिकता नहीं है, बल्कि एक वास्तविक और सार्थक प्रक्रिया होनी चाहिए। विशेष रूप से जब कर्मचारी जेल में हो या स्वास्थ्य की दृष्टि से भी अक्षम हो। ऐसे मामलों में संवेदनशीलता और व्यावहारिक दृष्टिकोण आवश्यक है, अन्यथा न्याय प्रक्रिया अन्यायपूर्ण बन सकती है।