इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि दोषपूर्ण जांच के आधार पर डिस्चार्ज नहीं मिल सकता। यदि प्रथम दृष्टया अपराध बनता है तो आरोपी को ट्रायल का सामना करना ही होगा। केस डायरी में कथित गड़बड़ी जैसे मुद्दों की जांच ट्रायल के दौरान की जाएगी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि दोषपूर्ण जांच के आधार पर डिस्चार्ज नहीं मिल सकता। यदि प्रथम दृष्टया अपराध बनता है तो आरोपी को ट्रायल का सामना करना ही होगा। केस डायरी में कथित गड़बड़ी जैसे मुद्दों की जांच ट्रायल के दौरान की जाएगी। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह ने आमिर जमीर अहमद की याचिका पर सुनवाई करते हुए की।
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आरोपी आमिर जमीर अहमद के खिलाफ एक ट्रक से मवेशियों के अवैध परिवहन के आरोप में शंकरगढ़ थाने में मुकदमा दर्ज किया गया था। अभियोजन के अनुसार 12 दिसंबर 2019 को पुलिस को सूचना मिली कि एक ट्रक से मवेशियों को अवैध रूप से ले जाया जा रहा है। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर कार्रवाई की, जिसमें कुछ आरोपी भाग गए और कुछ को गिरफ्तार किया गया। आरोप है कि ट्रक चालक ने पुलिस टीम को कुचलने का भी प्रयास किया।
वहीं, याची का कहना था कि उसे मौके से गिरफ्तार नहीं किया गया, बल्कि पुलिस ने थाने बुलाकर फर्जी तरीके से फंसाया। साथ ही केस डायरी के एक महत्वपूर्ण पर्चे में छेड़छाड़ कर उसके पक्ष के साक्ष्य हटा दिए गए। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्य से प्रथम दृष्टया आरोपी के खिलाफ मामला बनता है। इसलिए ट्रायल कोर्ट की ओर से डिस्चार्ज अर्जी खारिज करने और आरोप तय करने का आदेश सही है।
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यह होता है डिस्चार्ज
किसी व्यक्ति को उसके खिलाफ चल रही कानूनी कार्यवाही, दायित्व या आरोप से मुक्त करना। यह आमतौर पर यह तब होता है जब अदालत मानती है कि प्रथम दृष्टया आरोपी के खिलाफ मामला चलाने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं। इस पर आरोपी को बरी कर दिया जाता है।