इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि बार कौंसिल से अनुशासनात्मक कार्यवाही में किसी अधिवक्ता का दोषमुक्त होना, उसी विवाद से जुड़े आपराधिक मुकदमे को रद्द करने का आधार नहीं बन सकता है। अदालत ने कहा कि अनुशासनात्मक और आपराधिक कार्यवाही दोनों अपने उद्देश्य, प्रक्रिया और सबूत के मानक में पूरी तरह अलग हैं। इसलिए दोनों कार्यवाही समानांतर रूप से चल सकती हैं। यह आदेश न्यायमूर्ति जय प्रकाश तिवारी की एकलपीठ ने याची वकील योगेश कुमार भेंतवाल की मुकदमा रद्द करने की अर्जी पर दिया है।
गाजियाबाद निवासी योगेश पर थाना कविनगर में धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि योगेश ने अनुकूल आदेश दिलाने का आश्वासन देकर उससे 6.36 लाख की राशि ली और धोखाधड़ी की। ट्रायल कोर्ट ने 20 मई 2017 को आरोप पत्र का संज्ञान लेते हुए समन आदेश जारी किया। याची ने इसके खिलाफ हाईकोर्ट में अर्जी दायर कर मुकदमे की पूरी कार्यवाही रद्द की करने की गुहार लगाई।
याची अधिवक्ता ने दलील दी कि शिकायतकर्ता ने इसी आरोप को आधार बनाकर बार कौंसिल ऑफ यूपी में एडवोकेट्स एक्ट की धारा 35 के अंतर्गत अनुशासनात्मक शिकायत दर्ज की थी। दोनों पक्षों को सुनने के बाद बार कौंसिल ने शिकायत खारिज कर दी और उन्हें दोषमुक्त घोषित कर दिया। ऐसे में जब बार कौंसिल ने ही आरोपों को अविश्वसनीय मानकर खारिज कर दिया तो आपराधिक मुकदमा चलाने का कोई आधार शेष नहीं रह जाता है।
मामला मूल रूप से सिविल प्रकृति का है और आपराधिक कार्यवाही शुरू करना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है। हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद बार कौंसिल से राहत मिलने के आधार पर मुकदमा रद्द करने से इन्कार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 482 के तहत आपराधिक कार्यवाही तभी रद्द की जा सकती है जब शिकायत में दर्ज तथ्य प्रथम दृष्टया कोई अपराध सिद्ध न करते हों। कोर्ट ने याचिका में कोई मेरिट न पाते हुए उसे खारिज कर दिया।