याचियों के अधिवक्ता ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट ने जल्दबाजी में आदेश पारित किया है। क्योंकि,14 अगस्त 2024 को सर्वोच्च न्यायालय ने मामले में एसएलपी का निपटारा किया था। इसकी जानकारी ट्रायल कोर्ट को दी गई थी। बताया गया था कि आदेश अपलोड होने वाला है पर ट्रायल कोर्ट ने उसके आदेश का इंतजार नहीं किया। साथ ही गवाहों की जिरह में विरोधाभास के बावजूद समन जारी कर दिया गया।
वहीं, वादी के वकील ने दलील दी कि यह दोहरा हत्याकांड है। आरोपियों के नाम मुख्य प्राथमिकी में दर्ज थे। केवल स्वतंत्र गवाहों के बयानों के आधार पर नाम निकालना गलत था। वादी का दावा था कि आरोपियों ने सीधे तौर पर फायरिंग की थी। उनके खिलाफ मुकदमा चलना जरूरी है।
हाईकोर्ट ने कहा कि सीआरपीसी की धारा-319 के तहत शक्ति का प्रयोग सावधानी से होना चाहिए। ऐसे में कोर्ट ने पुनरीक्षण अर्जी को स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया।
क्या है सीआरपीसी की धारा-319
सीआरपीसी की धारा-319 (अब बीएनएसएस की धारा-258) अदालत को ट्रायल के दौरान प्रथम दृष्टया किसी ऐसे व्यक्ति की संलिप्तता का साक्ष्य प्रकाश में आने पर, जिसका नाम न एफआईआर में है और न ही आरोप पत्र में, उसे बतौर आरोपी तलब करने की शक्ति देती है।