कोर्ट की टिप्पणी
इस्लाम धर्म में बहुविवाह की अनुमति भी सशर्त ही है। इसका ऐतिहासिक कारण है। अरब में आदिम कबिलाई झगड़ों में बड़ी संख्या में महिलाएं विधवा व बच्चे अनाथ हो गए थे। अनाथ बच्चों की सुरक्षा व संरक्षा के लिए बहु-विवाह की प्रथा शुरू हुई थी। लेकिन, अब हालात बदल गए हैं। यही वजह है कि देश में समान नागरिक संहिता की मांग उठ रही है। इस पर विधायिका को गंभीरता से विचार करना चाहिए - हाईकोर्ट
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 25 धार्मिक आस्था के अनुसार व्यक्ति को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य तथा संविधान के भाग-तीन के अन्य प्रावधानों के अधीन है। इसलिए, अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता अप्रतिबंधित नहीं है और इसे राज्य द्वारा विनियमित किया जा सकता है।
इस्लाम के धार्मिक ग्रंथों का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि …यह स्पष्ट है कि धार्मिक ग्रंथ पुरुषों से कहता है कि पहले अनाथों की देखभाल के बारे में सोचें और केवल तभी जब उन्हें लगे कि वे अकेले रहकर अनाथों के हितों के साथ न्याय करने में सक्षम नहीं हो सकते हैं, उन्हें उनकी विधवा माताओं से शादी करने पर विचार करना चाहिए। इस शर्त पर कि नए परिवार के साथ मौजूदा परिवार के समान न्याय किया जाएगा।
यदि विवाह मुस्लिम कानून के तहत हुआ है तो एक से अधिक पत्नियां रखने पर मुस्लिम व्यक्ति के खिलाफ द्विविवाह का अपराध नहीं माना जाएगा, लेकिन पहला विवाह विशेष विवाह अधिनियम, विदेशी विवाह अधिनियम, ईसाई विवाह अधिनियम, पारसी विवाह और तलाक अधिनियम या हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत किया गया हो और वह इस्लाम धर्म अपनाने के बाद मुस्लिम कानून के अनुसार दूसरा विवाह करता है तो वह अपराध माना जाएगा।