इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि कोई मुआवजे की पर्याप्तता से संतुष्ट नहीं है तो वह डीएम से नहीं, जिला जज से संपर्क करे। क्योंकि, सुप्रीम कोर्ट ने पॉवर ग्रिड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड मामले में कहा है कि मुआवजे की पर्याप्तता का निर्धारण क्षेत्राधिकार डीएम का नहीं, जिला जज का है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि कोई मुआवजे की पर्याप्तता से संतुष्ट नहीं है तो वह डीएम से नहीं, जिला जज से संपर्क करे। क्योंकि, सुप्रीम कोर्ट ने पॉवर ग्रिड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड मामले में कहा है कि मुआवजे की पर्याप्तता का निर्धारण क्षेत्राधिकार डीएम का नहीं, जिला जज का है।
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यह टिप्पणी कर न्यायमूर्ति शेखर बी.सराफ, न्यायमूर्ति विपिन चंद्र दीक्षित की खंडपीठ ने बरेली के राजेंद्र प्रसाद व अन्य की याचिका पर की। उत्तरी क्षेत्र प्रणाली सुदृढ़ीकरण योजना के तहत 400 केवी बरेली-काशीपुर-रुड़की-सहारनपुर ट्रांसमिशन लाइन बिछाने के लिए पावर ग्रिड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (पीजीसीआईएल) ने याचियों की जमीन चिह्नित की। ट्रांसमिशन लाइन बिछाने के लिए पेड़ काटे जाने थे।
2015 में पीजीसीआईएल ने देय मुआवजे के बदले याचियों को कुछ चेक दिए। इस पर कुछ ने कम मुआवाज मिलने का दावा कर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कहा, उन्हें अन्य की तुलना में मुआवजा कम मिला है। इस पर हाईकोर्ट ने उन्हें बरेली के डीएम से संपर्क करने का निर्देश दिया। डीएम ने बरेली व रामपुर के किसानों को समान मुआवजा देने का आदेश दिया। इस पर पीजीसीआईएल ने डीएम के अधिकार क्षेत्र को चुनौती देते हुए याचिका दायर की।
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कोर्ट ने याचिका खारिज कर कहा, डीएम ने हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुसार एक प्रशासनिक आदेश पारित किया था। इसके बाद विभिन्न किसानों ने लाइन बिछाने के लिए काटे गए पेड़ों के मुआवजे के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। वहीं, इसी दौरान केंद्र सरकार ने 2015 में खंभों/टावरों के निर्माण के कारण भूमि को हुए नुकसान के लिए मुआवजा देने को एक नीति बनाई।
इसके तहत डीएम को पेड़ों की कटाई का मुआवजा तय करना था। यह नीति 2019 में लागू की गई। इसके बाद याचियों ने नई नीति के अनुसार क्षतिपूर्ति का दावा कर डीएम के समक्ष अभ्यावेदन दाखिल किया। डीएम की ओर से अभ्यावेदन पर कोई फैसला न लेने पर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट ने कहा, टेलीग्राफ अधिनियम के तहत भुगतान किए गए मुआवजे की पर्याप्तता या उसके संबंध में कोई विवाद उत्पन्न होता है तो पीड़ित उस क्षेत्राधिकार के जिला जज से संपर्क कर सकता है।