सजा के खिलाफ तीनों ने 1982 में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। अपील के दौरान राजेश, ओमवीर की सुनवाई बतौर वयस्क आरोपी चली, जबकि तीसरे आरोपी को 2017 में नाबालिग घोषित कर दिया गया। हाईकोर्ट ने 44 साल से लंबित अपील का निस्तारण करते हुए तीनों आरोपियों को मिली आजीवन करावास की सजा से बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि मामले मेंं पेश अभियोजन के गवाहों की ओर से मृतक के अंतिम दृश्य के संबंध में दिए बयानों में विरोधाभास और शव की बरामदगी संदेहास्पद है।
मुकदमेबाजी में बीत गई जवानी
मामले में 44 साल पहले फंसे राजेश और ओमवीर की उम्र अब 60 के पार है। जबकि, सजा पाने के बाद नाबालिग घोषित आरोपी भी अब 59 के करीब है। करीब चार दशक चली मुकदमेबाजी के बाद बेगुनाह साबित हुए तीनों आरोपियों की जवानी खाक हो गई।