याचियों की ओर से कहा गया कि उमेश पाल हत्याकांड के बाद एक मार्च को पुलिस तीनों को अवैध रूप से हिरासत में ले लिया। वे तीनों निर्दोष हैं और उन्हें घटना से कोई लेना-देना नहीं है। पुलिस तीन दिनों तक हिरासत में रखा और किसी भी मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया। परिजन एक थाने से दूसरे थाने तक याचियों की तलाश करते रहे। याचियों को पुलिस की मंशा सही नहीं लग रही है।
मामले में अपर शासकीय अधिवक्ता मनीष गोयल और अपर शासकीय अधिवक्ता प्रथम एक संड ने तर्क दिया कि तीनों याचियों ने सुनवाई के एक दिन पूर्व ही प्रेस क्लब में प्रेस कांफ्रेंस की। ऐसे में अवैध रूप से हिरासत मेें लेने का कोई प्रश्न ही नहीं है। पुलिस ने तीनों का आईपीसी की धारा 107/116 में चलान कर दिया है। कोर्ट ने सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित कर लिया था।