इलाहाबाद हाईकोर्ट ने झांसी के नवाबाद थाना क्षेत्र से जुड़े एक मामले में गिरफ्तारी और रिमांड आदेश को अवैध करार देते हुए बंदी को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने धर्मेंद्र लखेड़ा की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर दिया है।
याची के खिलाफ नवाबाद थाने में जालसाजी और विश्वासघात के आरोप में एफआईआर दर्ज है। आरोप है कि उसने फर्जी मुहर, हस्ताक्षर और बिल तैयार कर एक संस्थान का लगभग 2.74 करोड़ रुपये स्वयं की कंपनी के बैंक खाते में जमा करा लिए। पुलिस ने इस मामले में उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। याची ने गिरफ्तारी के खिलाफ हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की।
याची अधिवक्ता उदय भान सिंह ने दलील दी कि गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में नहीं बताए गए और मजिस्ट्रेट ने बिना पर्याप्त विचार किए रिमांड आदेश पारित कर दिया। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले के निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि गिरफ्तारी के आधार की लिखित सूचना देना अनिवार्य है और इसका पालन न होने पर गिरफ्तारी तथा रिमांड दोनों अवैध हो जाते हैं। वहीं, राज्य के वकील ने याचिका का विरोध किया।
कोर्ट ने पक्षों को सुनने और अभिलेखों का परीक्षण करने के बाद माना कि गिरफ्तारी और रिमांड आदेश कानून सम्मत नहीं थे। अदालत ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार गिरफ्तारी के आधारों की लिखित सूचना न देना गंभीर त्रुटि है। हाईकोर्ट ने गिरफ्तारी मेमो और रिमांड आदेश को निरस्त करते हुए याचिका मंजूर कर ली। अदालत ने बंदी को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया और कहा कि प्रमाणित प्रति मिलने का इंतजार किए बिना आदेश का पालन किया जाए। साथ ही रिमांड मजिस्ट्रेट को भविष्य में ऐसे मामलों में अधिक सावधानी बरतने की हिदायत दी गई।