फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

High Court :गाजियाबाद में बढ़ी प्रॉपर्टी टैक्स की दरों पर हाईकोर्ट की मुहर, कोर्ट ने कहा-कोई वैधानिक खामी नहीं

Thu, 26 Feb 2026 03:16 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गाजियाबाद नगर निगम की प्रॉपर्टी टैक्स की नई दरों को चुनौती देने वाली जनहित याचिका खारिज कर दी। मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने 77 पन्नों के विस्तृत निर्णय में कहा कि एक अप्रैल 2025 से लागू की गई बढ़ी दरों में कोई वैधानिक खामी नहीं है।
विज्ञापन
कोर्ट फैसला - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गाजियाबाद नगर निगम की प्रॉपर्टी टैक्स की नई दरों को चुनौती देने वाली जनहित याचिका खारिज कर दी। मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने 77 पन्नों के विस्तृत निर्णय में कहा कि एक अप्रैल 2025 से लागू की गई बढ़ी दरों में कोई वैधानिक खामी नहीं है। इस फैसले के बाद नगर निगम के लिए संशोधित दरों पर टैक्स वसूली का रास्ता साफ हो गया है।

विज्ञापन


कोर्ट ने उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम-1959 की धारा-174 का हवाला देते हुए कहा कि नगर आयुक्त को संपत्तियों का वार्षिक मूल्य निर्धारण और किराया दरें तय करने का पूर्ण वैधानिक अधिकार है। शहर को सड़कों की चौड़ाई और विकास के आधार पर ए, बी और सी श्रेणियों में वर्गीकृत करना तर्कसंगत और पारदर्शी प्रक्रिया का हिस्सा है।

साथ ही कोर्ट ने कहा कि नई दरें लागू करने से पहले विधि सम्मत प्रक्रिया अपनाई गई और आम जनता से आपत्तियां आमंत्रित की गईं। शासकीय अधिवक्ता ने दलील दी कि नगर निगम को कुल 318 आपत्तियां प्राप्त हुई थीं, जिनका परीक्षण और निस्तारण करने के बाद ही अंतिम अधिसूचना जारी की गई। कोर्ट ने टिप्पणी की कि याचिका जनहित से अधिक राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित प्रतीत होती है।
विज्ञापन


कोर्ट ने कहा कि प्रशासन ने नगर निगम के राजस्व और नागरिक हितों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया है। इसलिए केवल प्रक्रियात्मक आधार पर टैक्स वृद्धि को अवैध नहीं ठहराया जा सकता। 

राज्य सरकार का हस्तक्षेप वैध

जब नगर निगम बोर्ड और प्रशासन के बीच गतिरोध की स्थिति बनी, तब राज्य सरकार ने अधिनियम की धारा 116 के तहत हस्तक्षेप किया। कोर्ट ने इस हस्तक्षेप को भी विधिसम्मत ठहराया और कहा कि सार्वजनिक सेवाओं के सुचारु संचालन के लिए राजस्व संग्रह आवश्यक है। कोर्ट ने कहा कि कर में दी गई छूट को समाप्त करना नीतिगत निर्णय है, जिसमें न्यायिक हस्तक्षेप का दायरा सीमित होता है।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें