इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गुजारा भत्ते के एक मामले में कहा कि भरण-पोषण की राशि पति की वास्तविक आय और उसकी शारीरिक परिस्थितियों के आधार पर तय होनी चाहिए। इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की अदालत ने मुजफ्फरनगर के प्रधान पारिवारिक न्यायालय से निर्धारित दो हजार रुपये प्रतिमाह के गुजारा भत्ते को सही मानते हुए पत्नी की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।
मुजफ्फरनगर के पारिवारिक न्यायालय ने पति की मासिक आय पांच हजार रुपये मानते हुए पत्नी को दो हजार रुपये गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था। इसके खिलाफ पत्नी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। दलील दी कि परिवार न्यायालय ने अंतरिम गुजारा भत्ता तीन हजार रुपये तय किया था, जबकि अंतिम निर्णय में इसे घटाकर दो हजार रुपये कर दिया। पत्नी ने दावा किया था कि पति के पास 40 बीघा कृषि भूमि है और वह संपन्न है।
हालांकि, कोर्ट ने पाया कि पत्नी अपने दावों के समर्थन में कोई दस्तावेजी साक्ष्य पेश नहीं कर सकी। वहीं, उपलब्ध अभिलेखों से स्पष्ट हुआ कि पति 2017 में एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गया था और वर्तमान में अपने पिता की मेडिकल दुकान पर सहायक के रूप में काम कर रहा है।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि पति की आय का 25 प्रतिशत हिस्सा (जो इस मामले में 1250 रुपये होता है) गुजारा भत्ते के लिए उचित माना जाता है। ऐसे में 2,000 रुपये की राशि पहले से ही पर्याप्त है। लिहाजा, परिवार न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप का कोई कानूनी आधार नहीं है।