इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कार्यालय महालेखाकार (एजी ऑफिस) इलाहाबाद में कार्यरत सिविल एकाउंट्स ब्रदरहुड के तत्कालीन पदाधिकारियों को उन पर लगाए गए आरोपों से मुक्त कर दिया है। कहा कि अभियोजन गवाहों ने मामले का समर्थन नहीं किया और सह-अभियुक्तों को ट्रायल कोर्ट ने पहले ही बरी कर दिया है। ऐसे में याचियों को मुकदमे का सामना करने का निर्देश देने से कोई उद्देश्य पूरा नहीं होगा।
न्यायमूर्ति संजय कुमार सिंह की अदालत ने हरिशंकर तिवारी व दो अन्य की ओर से दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर यह आदेश दिया। महालेखाकार कार्यालय के पुराने बहुमंजिला भवन में 24 फरवरी 2012 को दोपहर में ताला बंदकर अधिकारियों की ओर से औचक हाजिरी ली गई। इस दौरान कई अधिकारी व कर्मचारी अनुपस्थित पाए गए। इसके कुछ देर बाद सभी अनुभागों के कर्मचारी एकत्रित होकर डिप्टी महालेखाकार (प्रशासन) के साथ गालीगलौज करते हुए धक्कामुक्की करने लगे। उनके कमरे में भी घुसने की कोशिश करने लगे। इस दौरान एकत्रित भीड़ उग्र हो गई और दरवाजे व खिड़कियों के शीशे आदि तोड़ दिए। कार्यालय के बाहर खड़ी निजी कार भी क्षतिग्रस्त कर दी।
इस घटना के बाद कर्मचारियों पर सिविल लाइन थाने में आपराधिक धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया गया। इसमें एजी ब्रदरहुड के तत्कालीन अध्यक्ष हरिशंकर तिवारी, आंतरिक मंत्री अश्विनी कुमार पांडेय, कल्याण मंत्री मुहम्मद आदिल इकबाल सहित 13 कर्मचारियों को आरोपी बनाया गया। आरोपों को निरस्त करने के लिए ट्रायल कोर्ट के समक्ष कर्मचारियों ने डिस्चार्ज आवेदन दाखिल किया, जिसे कोर्ट ने आठ जनवरी 2020 के आदेश से खारिज कर दिया।
इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए आपराधिक पुनरीक्षण दायर किया। हाईकोर्ट ने वकील की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए तीनों कर्मचारियों को आरोपों से बरी कर दिया।