मस्जिद पक्ष ने कहा- जिला जज ने दिया है विरोधाभासी आदेश
मस्जिद पक्ष के अधिवक्ता ने कहा कि 17 जनवरी 24 के मूल आदेश से जिला जज ने विवादित भवन की सुरक्षा व देखरेख करने व किसी प्रकार का बदलाव न होने देने का भी निर्देश दिया है और 31 जनवरी 24 के आदेश से बैरिकेडिंग काट कर तहखाने में पूजा के लिए दरवाजा बनाने तथा ट्रस्ट को पुजारी के जरिए तहखाने में स्थित देवी देवताओं की पूजा करने की अनुमति देकर अपने ही आदेश का विरोधाभासी आदेश दिया है।
इसके अलावा डीएम को रिसीवर नहीं नियुक्त किया जा सकता है। क्योंकि, डीएम काशी विश्वनाथ ट्रस्ट के पदाधिकारी हैं। रेवेन्यू के सर्वेसर्वा हैं। कानून व्यवस्था भी उन्हें देखना है। इसके साथ ही वह इस केस में प्रतिवादी हैं। यह भी कहा कि तहखाने पर किसका अधिकार है। यह साक्ष्यों के बाद सिविल वाद के निर्णय से तय होगा।जिला जज ने अंतरिम आदेश से फाइनल रिलीफ देकर गलती की है। इसलिए जिला जज के आदेश रद किए जाय।
मंदिर पक्ष ने कहा - अदालत ने कोई नया अधिकार नहीं दिया है
मंदिर पक्ष के अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन, हरिशंकर जैन और काशी विश्वनाथ ट्रस्ट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सी एस वैद्यनाथन, विनीत संकल्प ने भी पक्ष रखा। इनका कहना था कि अदालत को धारा 151 व 152 के अंतर्गत न्याय हित में आदेश देने का अंतर्निहित अधिकार है। वादी अधिवक्ता के संज्ञान में लाने के बाद अदालत ने छूटी हुई प्रार्थना स्वीकार की है। वादी के बजाय अदालत ने ट्रस्ट को पुजारी के जरिए पूजा का अधिकार बहाल किया है। वादी व्यास जी के तहखाने में वर्षों से पूजा अर्चना करता आ रहा है। 1993 में श्रीराम जन्मभूमि विवादित ढांचा गिराए जाने के बाद ज्ञानवापी की लोहे की बाड़ से बैरिकेडिंग करने के कारण तहखाने में पूजा करने से बिना किसी आदेश के रोक लगा दी गई। अदालत ने कोई नया अधिकार नहीं दिया है।
कहा कि जिला जज ने अर्जी की तीन बार सुनवाई की तिथि तय की किंतु मस्जिद पक्ष की तरफ से कोई आपत्ति नहीं की गई। दोनों पक्षों को सुनकर जिला जज ने 31 जनवरी का दूसरा आदेश जारी किया है जो 17 जनवरी के मूल आदेश का ही हिस्सा है। अदालत के गलती दुरूस्त करने व छूटे आदेश को पारित करने का पूरा अधिकार है। आदेश कानूनी प्रक्रिया के तहत पारित किया गया है। दीन मोहम्मद केस में कोर्ट ने व्यास जी के तहखाने का जिक्र किया है।
डीएम को रिसीवर नियुक्त करना गलत नहीं
जितेंद्र व्यास के पूजा करने को स्वीकार किया गया है। इसलिए अपीलें बलहीन होने के नाते खारिज की जाय। प्रदेश सरकार की तरफ से महाधिवक्ता अजय कुमार मिश्र, मुख्य स्थाई अधिवक्ता कुणाल रवि व हरे राम त्रिपाठी ने पक्ष रखा। महाधिवक्ता का कहना था कि कानून व्यवस्था कायम रखने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है। अदालत के आदेश पर अमल कराना सरकार का दायित्व है। कोर्ट के समय-समय पर दिए गए आदेशों के अनुसार डीएम अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे हैं। उन्हें रिसीवर नियुक्त करना गलत नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता सीएस वैद्यनाथन ने लगभग 40 मिनट तक तर्क प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि ज्ञानवापी के दाहिने हिस्से में तहखाना स्थित है, जहां हिंदू वर्ष 1993 तक पूजा कर रहे थे। सीपीसी के आदेश 40 नियम एक तहत वाराणसी कोर्ट ने डीएम को रिसीवर नियुक्त किया है। पूजा का आदेश किसी तरह से मुस्लिमों के अधिकारों को प्रभावित नहीं करता है क्योंकि मुसलमान कभी तहखाने में नमाज नहीं पढ़ता था।
नकवी ने पं चंद्रनाथ व्यास के वसीयत का हवाला दिया। कहा कि इस दस्तावेज में संपत्ति का कुछ विवरण दिया गया है लेकिन सब कुछ नहीं है। उन्होंने शैलेंद्र कुमार पाठक, जितेंद्र कुमार पाठक और काशी विश्वनाथ ट्रस्ट द्वारा निष्पादित दस्तावेज पेश किया। हिंदू पक्ष के वकील विष्णु शंकर जैन ने कहा कि डीएम ने सिर्फ इसी मामले में कोर्ट के आदेश का पालन नहीं कराया बल्कि नमाज के दौरान मस्जिद परिसर में वजू का इंतजाम भी कराया था। उस वक्त मुस्लिम पक्ष ने कोई आपत्ति नहीं की थी।