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प्रयागराज में गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर की आखिरी निशानी भी मिटी, ‘शांतावास’ पर चला बुलडोजर

Thu, 22 Oct 2020 01:30 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
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रवींद्रनाथ टैगोर - फोटो : सोशल मीडिया
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संगमनगरी में गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर की आखिरी निशानी भी मिट गई। छह, हैमिल्टन रोड स्थित ‘शांतावास’ बुलडोजर से ढहा दिया गया। गुरुदेव जब कभी प्रयागराज आते इसी बंगले में ठहरते। अब रह गई हैं तो बस इस बंगले से जुड़ी उनकी यादें। 
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बंग समाज से लेकर जाने कितनी संस्थाओं ने जब-तब गुरुदेव से जुड़े इस ठौर ‘शांतावास’ को बचाने और स्मारक बनाने के लिए कथित प्रयास किए लेकिन सब बेमानी रहा। अब यह बंगला स्मृतियों तक सिमट कर रह गया। ‘शांतावास’ के नाम से चर्चित लेकिन अरसे से उपेक्षित हैमिल्टन रोड स्थित इस बंगले को वर्षों पहले गुरुदेव स्मारक बनाए जाने के लिए आवाज उठी थी। बांग्ला समाज सहित गुरुदेव के प्रशंसकों की मंशा थी कि शांति निकेतन की ही तर्ज पर ‘शांतावास’ भी गुरुदेव का स्मारक बने। यहां उनके गीत-संगीत सहित नृत्य, नाटक आदि पर शोध हो ताकि उनकी स्मृतियां गूंजती तथा अक्षुण्ण बनी रहें। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो सका।

तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से गुहार लगाने से लेकर अनेक संस्थाओं, कमेटियों की संस्तुतियों के साथ सरकारी दफ्तरों में आवेदन दिए गए तो फेसबुक, व्हाट्सएप आदि पर भी गुरुदेव की विरासत को बचाने की मुहिम चली लेकिन मामला जस का तस रहा। दरअसल बंगले के स्वामित्व से जिनका नाम जुड़ा था, उनका प्रदेश के पहले महाधिवक्ता बाबू प्यारे लाल बनर्जी के परिवार से नाता रहा। बंगाली वेलफेयर ऐंड कल्चरल एसोसिएशन के सचिव शंकर चटर्जी भी कहते हैं, एसोसिएशन ने इस बारे में पहल की थी लेकिन कई आपत्तियों के कारण मामला जहां का तहां रह गया।

बंगले से रहा गुरुदेव का करीबी नाता

छह, हैमिल्टन रोड वाला बंगला प्रदेश के पहले महाधिवक्ता बाबू प्यारे लाल बनर्जी का था, जिनसे गुरुदेव की भांजी शांता ब्याही गईं थीं। इस रिश्ते से कविगुरु जब भी यहां आते, इसी बंगले में ठहरते। यहीं रहकर उन्होंने ‘तोड़े हो द्वार आए हो ज्योतिर्मय, तुम्हारी हो जय/तिमिर विदार उदार अम्भुदय, तुम्हारी हो जय’, आकाश के नीड़/क्या तुम उनके जैसा सत्य नहीं हो, हाय छवि, तुम केवल छवि’ सहित अनेक रचनाएं यहीं लिखीं।
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