15 साल से नहीं ले गए शस्त्र
जानसेनगंज में 76 साल पुरानी शस्त्र दुकान चला रहे एएन नियोगी बताते हैं कि कई असलहे 10 से 15 सालों से दुकानों पर ही रखे हैं। किराया भी नहीं मिल रहा। शस्त्र के रखे होने पर लोगों को फोन करते हैं, लेकिन कोई नहीं आता। यह शस्त्र दुकानदारों पर बोझ बन गए हैं।
नियोगी बताते हैं कि कई लाइसेंस धारियों की काेरोना काल में माैत हो गई थी, उनके लाइसेंस भी जमा हैं। उनके घरवाले न तो लाइसेंस ट्रांसफर करा पा रहे हैं और न बेच पा रहे हैं। इस हाल में शस्त्र की सुरक्षा करना दुकानदार की मजबूरी है और दुकानदारी भी दिखावे की। कहने को दुकानों में एक लाख से लेकर छह लाख रुपये तक के असलहे रखे हैं। जमा असलहों में सबसे ज्यादा एक नाली और दोनाली बंदूकें हैं।
नई पीढ़ी नहीं चाहती शस्त्र दुकानें चलाना
शस्त्र विक्रेता बताते हैं कि इस पेशे में न ठसक रही, न ही कोई खास कमाई। इस कारण बच्चों में इस काम को लेकर कोई रुचि नहीं है। बच्चे अब डॉक्टर-इंजीनियर बनना चाहते हैं, अथवा दूसरे पेशे में जाना। यह दुकानें हमारी ही पीढ़ी तक चल रही हैं। आगे तो बंद ही होना है।