पश्चिमी उत्तर प्रदेश के यमुना-कृष्णी दोआब इलाके में भूजल तेजी से नीचे जा रहा है। अगर इसी तरह लगातार पानी निकाला जाता रहा तो साल 2027 तक कई जगहों पर भूजल स्तर करीब 13.42 मीटर तक नीचे पहुंच सकता है। मोतीलाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एमएनएनआईटी) के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रो. राजमोहन सिंह, प्रवीन कुमार और अनुराग यादव के शोध में यह जानकारी सामने आई है। यह शोध करेंट साइंस पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।
शोधकर्ताओं के मुताबिक शामली, मेरठ, आगरा, गाजियाबाद जैसे पश्चिमी यूपी के शहरों में खेती, घरों और उद्योगों के लिए भूजल सबसे बड़ा जल स्रोत है लेकिन बढ़ती आबादी और जरूरतों के कारण लगातार ज्यादा पानी निकाला जा रहा है। इसी वजह से भूजल स्तर हर साल गिरता जा रहा है। रिपोर्ट में बताया गया कि भारत के करीब 85 प्रतिशत ग्रामीण इलाकों की पानी की जरूरत भूजल से ही पूरी होती है।
आधुनिक तकनीक से किया गया अध्ययन
इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने सॉइल एंड वाटर असेसमेंट टूल (स्वाट) और माॅडफ्लो जैसे कंप्यूटर मॉडल का इस्तेमाल किया। इनकी मदद से यह समझने की कोशिश की गई कि बारिश का पानी जमीन में कितना जा रहा है, कितना बह रहा है और भूजल पर उसका क्या असर पड़ रहा है। इस दौरान यह पता चला कि कुल बारिश का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा ही भूजल के रूप में जमीन के अंदर पहुंच पा रहा है। वहीं करीब 34 प्रतिशत पानी सतही बहाव में चला जाता है और लगभग 47 प्रतिशत पानी वाष्प बनकर उड़ जाता है।
कुछ गांवों में ज्यादा खतरा
वैज्ञानिकों ने माना कि अगर भूजल रिचार्ज कम हुआ और पानी निकालने की रफ्तार बढ़ी तो शामली के लिलोन गांव में 12 मीटर से ज्यादा भूजल गिर सकता है। वहीं ताहरपुर, भाभीसा और जैसाला गांवों में भी पांच मीटर से अधिक गिरावट आ सकती है।
वर्षा जल संचयन से मिल सकती है राहत
शोधकर्ताओं ने भूजल संरक्षण के लिए कुछ सुझाव दिए हैं-
1. वर्षा जल संचयन को बढ़ावा दिया जाए
2. भूजल दोहन पर सख्त नियंत्रण लागू किया जाए
3. कृत्रिम पुनर्भरण परियोजनाएं शुरू की जाएं
4. सतही और भूजल का संयुक्त उपयोग बढ़ाया जाए
5. जल संरक्षण को लेकर स्थानीय स्तर पर जागरूकता बढ़ाई जाए