इलाहाबाद को स्मार्ट सिटी बनाने के लिए नगर निगम ने योजनाएं भले बना ली हों लेकिन उसकी आंतरिक व्यवस्था गड़बड़ होने और राज्य वित्त आयोग से मिलने वाले फंड में कटौती का असर स्मार्ट सिटी के परिणाम से सामने आ गया है, क्योंकि स्मार्ट सिटी योजना में निगम कमियों के वेतन का समय से भुगतान, उनका स्किल डेवलपमेंट जैसी अनिवार्यता भी थी, जिस पर काम ही नहीं किया गया। अब अप्रैल में दूसरे चरण की रेटिंग के लिए निगम को नए सिरे से प्रयास करने होंगे।
इलाहाबाद को स्मार्ट सिटी के रूप में वैसे तो अमेरिका अपने स्तर से काम करेगा ही लेकिन नगर निगम का जोर केंद्र सरकार की ओर से स्मार्ट सिटी के चयन को लेकर ज्यादा था। वजह यह कि केंद्र सरकार से स्मार्ट सिटी चुने जाने पर पांच वर्ष तक हर साल नगर निगम को सौ करोड़ रुपये मिलते जिसका इस्तेमाल स्मार्ट सिटी बनाने में होना था। शर्त के तहत इतनी ही रकम राज्य सरकार को भी देनी थी। इसके लिए 30 नवंबर तक हुई ऑनलाइन प्रतियोगिता में निगम अफसरों ने तय मानकों को पूरा करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाया।
स्मार्ट सिटी की पहली सूची में नाम न शामिल होने के पीछे कर्मचारियों के वेतन का समय से भुगतान न होना, विकास कार्य प्रभावित होना भी कारण माना जा रहा है। हालांकि इसके लिए काफी हद तक प्रदेश सरकार भी जिम्मेदार है क्योंकि राज्य वित्त आयोग से वेतन, पेंशन मद में मिलने वाले फंड में से 60 फीसदी की कटौती कर दी गई। इस फंड से वेतन, पेंशन अदा करने के बाद जो रकम बचती थी, उसका इस्तेमाल विकास कार्य में होता था लेकिन 60 फीसदी की कटौती के बाद से अब तक नगर निगम हर माह किसी तरह रकम का जुगाड़ कर कर्मियों को वेतन दे रहा है।
गनीमत रही कि स्मार्ट सिटी योजना पर हो रहे काम से निगम प्रशासन हर माह वेतन के लिए रकम की व्यवस्था करता है, वर्ना फंड में कटौती के बाद से ही वेतन भुगतान का संकट खड़ा हो जाता।अब दूसरे चरण में स्मार्ट सिटी चयन का सिलसिला 15 अप्रैल से शुरू होना है। इसमें खरा उतरने के लिए निगम अफसरों को नए सिरे से योजना पर काम करना पड़ेगा। हालांकि वेतन, विकास कार्य समेत सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट की व्यवस्था भी अब तक ठीक होने के कारण दूसरे चरण में भी इलाहाबाद का चुना जाना आसान नहीं है।