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प्राकृतिक न्याय का पालन किए बिना कार्रवाई अनुचित

Sun, 31 Jan 2016 01:45 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/इलाहाबाद
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हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि अपराध की प्रकृति चाहे जितनी गंभीर हो बिना जांच और आरोपी को सुनवाई का मौका दिए कार्रवाई करना अनुचित है। कार्रवाई से पहले प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किया जाना जरूरी है। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस संबंध में एकल पीठ के फैसले को बहाल रखते हुए कर्मचारी की बर्खास्तगी का आदेश रद्द करने को सही करार दिया है। अनारदेवी खंडेलवाल महिला पालीटेक्निक के अधिकृत नियंत्रक की विशेष अपील को खारिज कर दिया है।
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अपील दाखिल कर एकल पीठ के निर्णय को चुनौती दी गई थी। कालेज के लिपिक पर आर्थिक घोटाले और फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नौकरी प्राप्त करने का गंभीर आरोप था। विभागीय कार्रवाई करते हुए उसे 26 अप्रैल 1993 को आरोप पत्र दिया गया, इसके बाद सीधे बर्खास्तगी की कार्रवाई कर दी गई। आरोपी क्लर्क ने इसके खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। याचिका कई वर्षों तक लंबित रही। नौ दिसंबर 2015 को एकल न्यायपीठ ने निर्णय सुनाया कि जांच अधिकारी ने गलत तरीके से जांच की। 
बिना किसी गवाह और साक्ष्य के आधार पर कर्मचारी पर आरोप सिद्ध कर दिया गया। कोर्ट ने माना कि जांच गलत तरीके से की गई है। हालांकि, एकल पीठ ने सही तरीके से विभागीय जांच पूरी करने और तब तक कर्मचारी को निलंबित रखने की छूट दी थी। एकल पीठ के आदेश को विशेष अपील में चुनौती दी गई थी। मुख्य न्यायमूर्ति डॉ. डीवाई चंद्रचूड और न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की पीठ ने एकल जज के निर्णय को सही करार देते हुए कहा कि इस मामले में नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत का पालन नहीं किया गया। 
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