फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

‘पूरी आजादी’ को तरस गई ‘आधी आबादी’

Sat, 15 Aug 2015 01:41 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
विज्ञापन
विज्ञापन
इलाहाबाद। यह कैसी आजादी, जहां बेटियां अंधेरे में घर से बाहर निकलती हैं तो मां-बाप की सांसें अटकी रहती हैं। सुरक्षा का मसला उनके कॅरियर की राह का सबसे बड़ा रोड़ा है। ससुराल में उन्हें मारा पीटा जाता है या जिंदा जला दिया जाता है। मन का साथी चुनने पर ऑनर किलिंग का शिकार होना पड़ता है। शादी के बाद यह कहकर गुलामी की बेड़ियां बांध दी जाती हैं कि घर और बच्चों को संभालो। अगर आवाज उठाने की कोशिश की तो जुल्म सहना पड़ता है। हो सकता है जब 15 अगस्त को पूरा देश आजादी मना रहा हो तो देश के किसी कोने में कोई महिला ऐसे ही जुल्म का हो रही हो।
विज्ञापन


आंकड़ों पर नजर डालें महिलाओं के प्रति अपराध का ग्राफ लगातार तेजी से बढ़ रहा है। लूट, हत्या, बलात्कार, छेड़खानी ने लड़कियों, महिलाओं का जीना मुहाल कर दिया है। 2015 के सिर्फ सात महीनों की बात की जाए तो महिला हत्या के 27, शीलभंग 172, अपहरण154, छेड़खानी 54, दहेज उत्पीड़न 188, चेन स्नैचिंग 32, बलात्कार 75 और दहेज मृत्यु के 56 मामले तो पुलिस रिकार्ड में दर्ज हैं। महिलाओं के साथ होने वाले न जाने कितने अपराध तो ‘समाज क्या कहेगा’ की सोच के चलते सामने ही नहीं आए होंगे।

 ‘कहने को बदलाव तो बहुत आया है लेकिन महिलाओं को आजादी नहीं मिली है। अपनी मेहनत की सैलरी वह अपनी मर्जी से खर्च नहीं कर सकती हैं। उसकी तनख्वाह को कैसे खर्च करना है, इसका फैसला पिता या पति करते हैं। अपनी मर्जी से निर्णय लेने का अधिकार भी नहीं है। महिलाओं की यह स्थिति निम्न से लेकर उच्च वर्ग तक हावी है।’ प्रो. रंजना कक्कड़, अध्यक्ष महिला सलाहकार बोर्ड, इविवि
विज्ञापन


‘महिलाओं को खुली हवा में सांस लेने की आजादी आज भी नहीं मिली है। घर से लेकर सड़क और ऑफिस तक हिंसा, शोषणा का शिकार होना पड़ रहा है। एक गृहणी परिवार के लिए 24 घंटों लगी रहती हैं और उससे कहा जाता है कि दिन भर तुम घर में करती क्या हो। आजादी तो सिर्फ शोपीस की तरह है। समय के साथ सकारात्मक बदलाव तो आए हैं लेकिन ऐसे नहीं जिसमें जश्न मनाया जा सकें।’ भावना शिक्षार्थीं, डिप्टी डायरेक्टर माध्यमिक शिक्षा
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें