43 वर्ष की उम्र में बन गए थे हाईकोर्ट के जज
न्यायमूर्ति कमल नारायण सिंह का जन्म 13 दिसंबर 1926 को मेजा के चकडीहा गांव के एक जमींदार परिवार में हुआ था। वह औपचारिक रूप से पश्चिमी शिक्षा प्राप्त करने वाले मांडा वंश में पहले व्यक्ति थे। एलआरएलए स्कूल, सिरसा से प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने इलाहाबाद में इविंग क्रिश्चियन कॉलेज में प्रवेश लिया।
1949 में विधि की पढ़ाई पूरी कर वकालत के पेशे में आ गए। 1963 में उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार के लिए कनिष्ठ स्थायी अधिवक्ता के रूप में नियुक्त किया गया था। वर्ष1967 में वह सीनियर स्टैंडिंग काउंसिल बने। 1970 में उन्हें उत्तर प्रदेश के महाधिवक्ता के रूप में नियुक्त किया गया लेकिन तीन महीने बाद ही 25 अगस्त 1970 को वह 43 वर्ष की आयु में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अतिरिक्त न्यायाधीश बने।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की पीठ पर 15 से अधिक वर्षों तक बैठने के बाद उन्हें 10 मार्च 1986 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय में पदोन्नत किया गया। 25 नवंबर 1991 को उन्होंने भारत के मुख्य न्यायाधीश का पद ग्रहण किया। वह 13 दिसंबर को सेवानिवृत्त हुए।
बाद में 1991 में उन्होंने 13वें विधि आयोग के अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया और 1994 में सेवानिवृत्त हुए। इसके बाद उन्होंने वाराणसी, उत्तर प्रदेश की उदय प्रताप कॉलेज एजुकेशनल सोसाइटी की प्रबंध समिति के अध्यक्ष के रूप में जिम्मेदारी संभाली। उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री, राम मनोहर लोहिया, राज नारायण और चौधरी चरण सिंह जैसे दिग्गजों के कानूनी मामलों का प्रतिनिधित्व भी किया था।