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पूर्व की अर्हता के लिए विभागीय अनुमति अनिवार्य नहीं

Sun, 10 Jan 2016 02:27 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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इलाहाबाद। विभागीय प्रोन्नति को लेकर हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि यदि प्रोन्नति के लिए आवश्यक शैक्षिक योग्यता कर्मचारी के पास सेवा में आने के पहले से ही है तो उसकी प्रोन्नति इस आधार पर नहीं रोकी जा सकती है कि उक्त अर्हता को प्राप्त करने के लिए उसने विभाग से अनुमति प्राप्त नहीं की है।
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इस संबंध में बने एक्ट की मंशा यह नहीं है कि पहले से ही आवश्यक शैक्षिक योग्यता रखने वाले व्यक्ति को प्रोन्नति के दायरे से बाहर कर दिया जाए। लोक निर्माण विभाग के माधवेंद्र सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश डॉ. डीवाई चंद्रचूड और न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की खंडपीठ ने याची को विभागीय प्रोन्नति से बाहर रखने का आदेश रद्द करते हुए एक माह के भीतर उसे प्रोन्नति सूची में शामिल करने का आदेश दिया है।

माधवेंद्र पीडब्ल्यूडी में पांच मई 1999 को लिपिक के पद पर चयनित किया गया। इसके बाद वह प्रोन्नति पाकर वरिष्ठ लिपिक बन गया। आठ जनवरी को विभाग में जूनियर इंजीनियरों की भर्ती के लिए अधिसूचना जारी की गई। इसके तहत 95 प्रतिशत पद सीधी भर्ती से और पांच प्रतिशत प्रोन्नति के द्वारा पद भरे जाने थे। प्रोन्नति के लिए ग्रुप सी के वह कर्मचारी अर्ह थे जिन्होंने सेवा में आने के बाद विभाग की अनुमति से इंजीनियरिंग में डिप्लोमा हासिल किया था।
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याची के पास सेवा में आने से पहले ही इंजीनियरिंग में डिप्लोमा था।

प्रोन्नति नियमावली में सेवा के दौरान विभागीय अनुमति से डिप्लोमा लेने वालों को प्रोन्नति दिए जाने की शर्त के आधार पर याची का नाम प्रोन्नति सूची में शामिल नहीं किया गया। इसे कोर्ट में चुनौती दी गई। हाईकोर्ट ने कहा कि विभागीय नियमावली की मंशा यह नहीं है कि जिनके पास पहले से ही अर्हता है उनको प्रोन्नति में शामिल न किया जाए।
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