किसी भी विश्वविद्यालय में बांसुरी का कोई विभाग नहीं
यही ऐसा बाजा है जिसमें बिना तार-चमड़ा के ही सांस की दमकशी से अनूठे स्वर, छंद, अलंकार निकलते हैं, लेकिन हमारे देश के किसी भी विश्वविद्यालय में बांसुरी का कोई विभाग नहीं है। बांसुरी जैसा वाद्ययंत्र नहीं पढ़ाया जाता।
उस्ताद जाकिर हुसैन के बहाने वतन की मिट्टी के लिए दी नसीहत
उन्होंने ताल नाद के महानायक उस्ताद जाकिर हुसैन को भी याद किया। कहा कि उस्ताद अमेरिका में जाकर बस गए और वहीं उनका इंतकाल भी हो गया। हमेशा अपने वतन की मिट्टी से प्यार करना चाहिए। मुझे जर्मनी, जापान, अमेरिका और इंग्लैंड कभी प्रिय नहीं लगा। मेरा मानना है कि चाहे संगीतकार बनिए या डाॅक्टर-इंजीनियर। अपने वतन के लिए काम करना चाहिए। दूसरे देश में जितना भी करेंगे, कोई आपके ऊपर भरोसा नहीं करेगा।
पृथ्वी का स्वर्ग है प्रयागराज, चाहता हूं जब भी जन्म लूं इसी धरती पर लूं
बच्चे से भी बढ़कर यहां के लोग मुझे करते हैैं प्यार। जीवन में पहली बार प्रयाग में बांसुरी खामोश है। आज लोग मुझे सुनना चाहते हैं, बांसुरी नहीं। जबकि, मैं बातें नहीं करता, बांसुरी बजाता हूं। मौका मिला तो महाकुंभ में भी बांसुरी की तान संगम तट पर सुनाऊंगा।