माघ मेले के सबसे बड़े स्नान पर्व मौनी अमावस्या पर आस्था उफान पर थी। संगम की रेती पर देर रात से श्रद्धालु अपने जत्थे के झंडे के पीछे चलते-चलते संगम तट पर पहुंचे। श्रद्धालुओं की भीड़ झंडे के पीछे पूरी तरह से अनुशासित नजर आई। शायद यह अनुशासन खोने के डर की वजह से भी था कि वह बस अड्डा, रेलवे स्टेशन से डंडे में लगे लाल, सफेद, केसरिया और पीले रंग के झंडे के पीछे-पीछे चलते गए।
आजमगढ़ से सवा सौ, गोरखपुर से 250, गाजीपुर से 100, बलिया से 73, जौनपुर से 70 और वाराणसी से करीब 200 श्रद्धालुओं का जत्था लाल, सफेद, केसरिया, पीले और हरे रंग के झंडे के पीछे चलते नजर आया। डंडे में झंडे लगाकर श्रद्धालुओं का पग-पग संगम की बढ़ता चला गया। वह गाते-झूमते त्रिवेणी तट पहुंचे और पुण्य की डुबकी लगाई।
वाराणसी से आया 200 श्रद्धालुओं के जत्थे ने आस्था की डुबकी लगाई। जत्थे की अगुवाई कर रहे रमेश चौरसिया ने बताया कि झंडे की वजह से किसी भी सदस्य के बिछड़ने की संभावना बेहद कम रहती है। सभी लोग झंडे को देखकर ही चलते हैं। आजमगढ़ से आए श्रद्धालुओं के दल के नरेश पंडा ने बताया कि गंगा में डुबकी लगाने के लिए झूंसी के अंदावा तिराहे से पैदल आए हैं। भीड़ को देखते हुए अपनों को साथ रखने का सबसे अच्छा तरीका डंडे में झंडा ही था। उसी को देखकर सभी आगे बढ़ते चले गए।