फिराक अस्वस्थ थे और उन्हें गोद में उठाकर मंच तक लाया गया था लेकिन फैज के संबोधन के बाद फिराक कहां चुप बैठने वाले थे। बोल पड़े, ‘आने वाली नस्लें तुम पर फख्र करेंगी हमअसरो/जब उनको यह ध्यान आएगा तुमने फिराक को देखा है।’ हालांकि तकरीबन साल भर बाद ही वह अदब को अनूठी विरासत देकर इस फानी दुनिया से कूच कर गए। लेकिन, आने वाली नस्लें फिराक पर कैसे फख्र कर सकेंगी, हमने उनकी विरासत को सहेज कर रखा ही नहीं। उनके बैंक रोड स्थित बंगले की सूरत तो बदल ही गई है, उनकी तमाम चीजें विश्वविद्यालय या किसी साहित्यिक संस्थान के पास भी नहीं हैं।
और तो और उनके अपने ही इलाहाबाद विश्वविद्यालय में उनकी एक प्रतिमा लगाने का प्रस्ताव आज तक अधूरा ही रह गया है। अरसा पहले इलाहाबाद विश्वविद्यालय की सांस्कृतिक समिति की ओर से प्रेमचंद और फिराक की प्रतिमाएं लगाने का प्रस्ताव पारित किया गया था। परिसर में प्रेमचंद की प्रतिमा तो लग गई लेकिन उर्दू या अंग्रेजी विभाग के सामने के सवाल पर फिराक की प्रतिमा लगाने का मामला टल गया। समिति और दृश्य कला विभाग के अध्यक्ष प्रो.अजय जैतली कहते हैं, प्रस्ताव के बाद मूर्ति कला विभाग के विद्यार्थियों ने फिराक की प्रतिमा बनाने की शुरुआत की थी लेकिन किन्हीं वजहों से यह काम आगे नहीं बढ़ सका। जल्द ही इस बारे में नए सिरे से पहल की जाएगी।