इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यावसायिक समझौते में मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) का प्रावधान होने या विवाद के दीवानी स्वरूप का तर्क देकर संज्ञेय आपराधिक अपराध में दर्ज एफआईआर रद्द नहीं कराई जा सकती। यदि प्रथम दृष्टया गबन या आपराधिक विश्वासघात जैसे अपराध के तत्व मौजूद हैं तो आपराधिक कार्यवाही जारी रहेगी। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति राजीव गुप्ता, न्यायमूर्ति डॉ.अजय कुमार की खंडपीठ ने वाराणसी निवासी अमित कुमार जायसवाल व एक अन्य की याचिका खारिज करते हुए की।
भारतीय रिजर्व बैंक से अधिकृत एक कंंपनी ने एटीएम संचालन के लिए याचियों के साथ मास्टर फ्रेंचाइजी समझौता किया था। कंपनी का आरोप है कि एटीएम में नकदी भरने के लिए बैंक से निकाले गए 43.37 लाख रुपये में पूरी रकम मशीनों में जमा नहीं की गई। बाद में 8.09 लाख और 4.32 लाख रुपये लौटाए गए। लेकिन 30.95 लाख रुपये अब तक जमा नहीं किए गए। कंपनी ने इसे गबन और आपराधिक विश्वासघात बताते हुए एफआईआर दर्ज कराई। याचियों की ओर से अधिवक्ता ने दलील दी कि विवाद पूरी तरह व्यावसायिक अनुबंध और खातों के मिलान (रिकंसिलिएशन) से जुड़ा है। समझौते में मध्यस्थता का प्रावधान होने के कारण आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि एफआईआर के आरोप केवल अनुबंध के उल्लंघन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि प्रथम दृष्टया गबन और आपराधिक विश्वासघात का मामला बनता है। यदि एक ही घटनाक्रम से दीवानी और आपराधिक दोनों प्रकार की जिम्मेदारी उत्पन्न होती है तो केवल दीवानी उपाय उपलब्ध होने से आपराधिक कार्रवाई समाप्त नहीं हो जाती। कोर्ट ने कहा कि आर्बिट्रेशन क्लॉज केवल दीवानी विवादों के समाधान का माध्यम है, किसी आपराधिक अपराध की जांच या अभियोजन का विकल्प नहीं।