गेहूं खरीद को लेकर नई समस्या खड़ी हो गई है। इसमें दोहरी नीति अपनाई जा रही है। इतना ही नहीं अफसरों के बयान में भी अंतर है। खासतौर पर, बारा तहसील में ओलावृष्टि का लाभ पा चुके किसानों से गेहूं लेने से मना कर दिया जा रहा है। तहसील में सत्यापन से ही मना कर दिया जा रहा है। अफसरों का कहना है कि दो योजनाओं का लाभ नहीं लिया जा सकता। इसके विपरीत एडीएम नागरिक आपूर्ति एवं विपणन विभाग के अफसरों का कहना है कि ऐसा कोई आदेश नहीं है।
किसान प्रति हेक्टेयर अधिकतम 38 क्विंटल गेहूं की बिक्री कर सकते हैं। इससे अधिक गेहूं सरकारी क्रय केंद्र पर नहीं लिए जाएंगे। ओलावृष्टि से फसल नुकसान होने का मुआवजा पा चुके किसानों को इससे भी वंचित होना पड़ रहा है। गेहूं बेचने के लिए किसानों को पहले तहसील से सत्यापन कराना पड़ता है लेकिन वहां से बड़ी संख्या में किसानों को वापस कर दिया जा रहा है। लालापुर के किसान हरिहर यादव का कहना है कि उन्हें यह कहकर वापस कर दिया कि ओलावृष्टि का एक बार लाभ पा चुके हैं। इसलिए सरकारी केेंद्र पर गेहूं की बिक्री नहीं कर सकते। शंकरगढ़ के जूही गांव के प्रधान विमल सिंह, जगदीश प्रसाद, महेंद्र मिश्र आदि का कहना है कि वे सोसाइटी पर गए थे लेकिन वापस कर दिया गया। सोसाइटी के लोगों का कहना था कि जिनकी फसल को 50 फीसदी से अधिक नुकसान हुआ है उन्हें तहसील से सत्यापन कराना होगा। इसी तरह की शिकायत, शंकरगढ़ के राममूरत पटेल, दीनानाथ आदि की भी है। वहीं एसडीएम बारा संदीप भागिया का कहना है कि किसानों को नुकसान का मुआवजा मिल चुका है। इसलिए नुकसान के अनुपात में ही गेहूं बिक्री की अनुमति दी जाएगी। इसके विपरीत संभागीय अधिकारी देवराज यादव का कहना है इस तरह का कोई निर्देश नहीं है। सभी का गेहूं लिया जाएगा। एडीएम नागरिक आपूर्ति का कहना है कि गेहूं बेचना कोई अतिरिक्त लाभ नहीं है। इसके अलावा गेहूं खरीद में यह नहीं देखा जाता कि उसने मुआवजा लिया या नहीं। सिर्फ गेहूं की गुणवत्ता देखी जाती है। मुआवजा पा चुके किसानों का गेहूं लिए जाने पर कोई रोक नहीं है।