एक ओर जहां साहित्य को सहेजने, वहीं दूसरी ओर ‘साहित्यतीर्थ’ को बिसराने की परंपरा रही है, निराला भी इसका अपवाद नहीं रह सके। साहित्य और प्रयागराज की पहचान, बीसवीं सदी के महानतम कवि महाप्राण निराला का स्मारक कुंभ के सौंदर्यीकरण की भेंट चढ़ गया। चौड़ीकरण और सौंदर्यीकरण के नाम पर दारागंज स्थित निराला प्रतिमा दूर ले जाकर जैसे-तैसे लगा दी गई, फिर भी उसका सौंदर्यीकरण नहीं हो सका।
निराला कहते थे, ‘देख चुका जो जो आए थे, चले गए, वह उनके ही संदर्भ में सच हुआ है। आती-जाती सरकारों के बीच निराला का जन्म शताब्दी वर्ष भी बीता लेकिन उनकी स्मृतियों को सहेजने के लिए कहीं कोई सार्थक पहल नहीं हुई। निराला निवास को संग्रहालय बनाए जाने की बात जाने कहां गुम हो गई। किराए का वह मकान जहां निराला ने अंतिम सांस ली, बिक गया। अब उसका स्वरूप भी बदल गया है।
दरअसल निराला जी बतौर किराएदार दारागंज स्थित अंबिका प्रसाद अवस्थी के मकान में नीचे के कमरे में रहते थे और मृत्युपर्यंत वहीं रहे। यहां उन्हें उनके एक मित्र और चलचित्र विभाग में काम करने वाले कमला शंकर सिंह ले गए थे, जिनका परिवार ऊपर की मंजिल में रहता था। निराला जी मृत्युपर्यन्त वहीं रहे। इस बीच वर्ष 1960 में उनके बेटे रामकृष्ण त्रिपाठी ने निराला जी की अस्वस्थता के कारण अपना तबादला जीआईसी, झांसी से जीआईसी इलाहाबाद करा लिया। लेकिन, निराला जी उनके साथ रहने को तैयार नहीं थी।
ऐसे में बेटे रामक़ृष्ण त्रिपाठी ने उनके पास ही किराए का घर ले लिया। निराला जैसे फक्कड़ पिता के बेटे रामकृष्ण के पास कोई पैतृक संपत्ति नहीं थी। पांच बच्चों की परवरिश में वह निराला आवास को नहीं खरीद सके। बाद में उन्होंने उसी गली में खपरैल का मिट्टी की दीवारों वाला पुराना घर खरीदा, जो आज का ‘निराला निवास’ है।
धरोहर के लिए राष्ट्रपति तक हुई थी फरियाद
कमला शंकर सिंह रिटायर होने के बाद अपने पैतृक गांव सागरपाली, बलिया चले गए। निराला जी के जन्मशती पर वामपंथी लेखक संगठनों ने राष्ट्रपति को ज्ञापन देकर उस घर को राष्ट्रीय स्मारक के रूप में विकसित करने की मांग की। इस बीच मकान मालिक को पता चला तो उन्होंने इसे दूसरे के साथ बेच दिया। इस बीच कई सरकारें आती-जाती रही। हिंदी संस्थानों ने हिंदी के नाम पर जाने कितना कुछ खर्च किया लेकिन निराला दारागंज में मूकदर्शक होकर सब कुछ देखते रहे।
कॉपीराइट को लेकर भी 18 बरस चला मुकदमा
निराला जी की मृत्यु के बाद प्रकाशकों से कॉपीराइट को लेकर भी तकरीबन अठारह वर्षों तक मुकदमा चला। बेटे रामकृष्ण त्रिपाठी की ओर से कॉपीराइट का मुकदमा जीतने के बाद राजकमल प्रकाशन से निराला.रचनावली आई, जिसकी रॉयल्टी से धीरे-धीरे कई चरणों में कच्चा मकान, पक्का बन सका।
संग्रहालय में है कलम, पांडुलिपि
प्रयागराज। निराला की स्मृतियों को सहेजने के मकसद से उनके पौत्र डॉ अमरेश त्रिपाठी की ओर से उनकी कलम, पांडुलिपि और कुछ कपड़े इलाहाबाद संग्रहालय को दिए गए थे ताकि उसके संरक्षण के साथ लोग उन्हें देख सकें।
निराला परिवार ही नहीं हिंदी प्रेमियों के लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम देश-विदेश से आने वालों को उस निराला का स्मारक और उनकी धरोहर नहीं दिखा सकते, जो हिंदी गांधी से हिन्दी के सवाल पर गांधी से झगड़ और नेहरू को डांट सकते थे।
विवेक निराला, प्रपौत्र